gulmohar
महिला की गरिमा और मानसिक पीड़ा को दर्शाती सशक्त कविता, जिसमें बिना शारीरिक स्पर्श के की गई हिंसक दृष्टि और नजरों के अपराध को शब्दों के माध्यम से उजागर किया गया है.

देह नहीं, आत्मा का अपमान

यह कविता एक स्त्री के उस अनुभव को गद्यात्मक रूप में सामने रखती है, जहां शारीरिक छेड़छाड़ के बिना भी उसकी गरिमा पर हमला किया जाता है. यह रचना बताती है कि किसी की घूरती, गंदी नजरें भी हिंसा का ही रूप होती हैं, जो मन को भीतर तक घायल कर देती हैं. कविता समाज को यह सोचने पर मजबूर करती है कि अपराध केवल स्पर्श से नहीं, बल्कि दृष्टि और मानसिक उत्पीड़न से भी होता है, और ऐसी हर सोच व व्यवहार के खिलाफ आवाज उठाना जरूरी है.

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अगर मैं किसी सुबह न उठूँ…

जिस सुबह वह नहीं उठी, वह हार नहीं थी वह एक चुप विदाई थी।रोज़ के झगड़ों, टूटती उम्मीदों और खुद को खो देने की थकान का अंत। जिसे वह प्रेम समझती रही, वह पत्थर निकला, और जिसे वह बचाती रही, वही उसे तोड़ता रहा।

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