अगर मैं किसी सुबह न उठूँ…
जिस सुबह वह नहीं उठी, वह हार नहीं थी वह एक चुप विदाई थी।रोज़ के झगड़ों, टूटती उम्मीदों और खुद को खो देने की थकान का अंत। जिसे वह प्रेम समझती रही, वह पत्थर निकला, और जिसे वह बचाती रही, वही उसे तोड़ता रहा।

जिस सुबह वह नहीं उठी, वह हार नहीं थी वह एक चुप विदाई थी।रोज़ के झगड़ों, टूटती उम्मीदों और खुद को खो देने की थकान का अंत। जिसे वह प्रेम समझती रही, वह पत्थर निकला, और जिसे वह बचाती रही, वही उसे तोड़ता रहा।
एक स्त्री थी, जिसका दिल खरगोश-सा नाज़ुक था। वह चाहती थी कि जीवन हँसी और प्रेम की बारिश से भीगे, पर उसकी भावनाओं को कभी महत्वपूर्ण नहीं समझा गया। ओस से भीगी घास को छूकर मुस्कराने की उसकी चाहत, दूसरों की कठोरता में दबकर रह गई। स्थूल प्रेम की निरंतर चोटों ने उसे भीतर से घायल कर दिया।
फिर एक दिन पछुआ हवा चली, बादल घिर आए और घनघोर वर्षा होने लगी। उस वर्षा में भीगते हुए उसने पहली बार अपने भीतर-बाहर बादलों का स्पर्श महसूस किया। हवा की अनंत यात्रा आकर उसकी छाती पर ठहर गई, और उसके भीतर का नाज़ुक दिल धड़कता रहा। जीवन के बेस्वाद गिलास में अचानक प्रेम का रंग घुलने लगा।
आज वही देवतुल्य बेटा, जिसके जन्म पर पूरा घर-आँगन गूँज उठा था, सरे-बाज़ार नंग-धड़ंग खड़ा है—इज़्ज़त के नाम पर। जिस बेटे के लिए माँ ने मन्नतों के धागे बाँधे थे, दादी ने मिठाइयाँ बाँटी थीं और बधाई गीत गाए थे, आज वही बेटे के संस्कार समाज के सामने नंगे खड़े हैं।
कभी पोते के स्वागत में पतोहू को चुनरी ओढ़ाई गई थी, बुआ ने देहरी पर नेग के लिए अड़ गई थी, भाभी के कंगन उतरवाए गए थे और दादा ने सातों पत्तलों पर भोज करवा शान से जश्न मनाया था। किन्नरों को बुलाकर डैडी ने चाँदी के सिक्के उछाले थे। यह सब उस इकलौते कुलदीपक के नाम पर हुआ, जिसे देवपुत्र की तरह पूजा गया।