
ममतासिंह देवा
बचपन में हर लड़की से कहा जाता था
“अपने घर जाना तो ऐसा करना,
अपने घर जाना तो वैसा करना।”
माँ के घर से अपने घर आ गए,
अपने इस घर में गच्चा खा गए।
अपने इस घर में सब कुछ था सहना,
अपने ही घर को अपना नहीं था कहना।
‘अपना’ कहने पर तूफ़ानी बवंडर था,
ताने सुन-सुनकर आँखों में समंदर था।
अपना घर समझकर इसको सजाते रहे,
दूसरों के आगे झूठ-मूठ का इतराते रहे।
मन नहीं चाहता था स्वीकारना इसको,
अपना कहकर बोला झूठ किसको, किसको?
माँ की बातों को मन से लगा लिया था,
दूसरे के घर को दिल से सटा लिया था।
न वो घर अपना था, न ये घर अपना है,
अपना घर तो बस एक सुनहरा सपना है।
छोटे थे तो गुड़ियों का भी घर हम बनाते,
काश, उस पर अपनी नेम प्लेट लगा आते।
लेखिका के बारे में-
ममता सिंह देवा
सृजन जिनके लिए केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक सतत साधना-पथ है. ममता सिंह देवा कला और साहित्य, दोनों क्षेत्रों में अपनी विशिष्ट पहचान रखने वाली सशक्त रचनाकार हैं। भारत में पॉटरी एवं सिरैमिक विषय में मास्टर्स करने वाली पहली महिला होने का गौरव उन्हें प्राप्त है। उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से बी.एफ.ए. तथा एम.एफ.ए. (पॉटरी एवं सिरैमिक) की शिक्षा प्राप्त की। अध्ययनकाल में ही उनकी प्रतिभा को भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा प्रदत्त राष्ट्रीय सांस्कृतिक छात्रवृत्ति (1995–96) से सम्मानित किया गया।
विवाह के उपरांत अठारह वर्षों के लंबे अंतराल के बाद उन्होंने अपने कलात्मक स्वप्नों को पुनः आकार देते हुए ‘आकार (AAKKAAR)’ स्टूडियो की स्थापना की। इस दौरान वे स्पिक-मैके (SPIC MACAY) से भी जुड़ी रहीं तथा जयपुर की प्रसिद्ध ब्लैक पॉटरी पर कार्यशालाओं का संचालन किया। उनकी सृजनात्मक यात्रा को वर्ष 2015–16 में भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा प्रदान की गई सीनियर फेलोशिप ने नई ऊँचाइयाँ प्रदान कीं।
उनकी कलाकृतियाँ देश के विभिन्न शहरों में आयोजित प्रदर्शनियों में सराही जाती रही हैं। कला के समानांतर साहित्य भी उनके व्यक्तित्व का अभिन्न पक्ष है। वर्ष 1982 से प्रारंभ हुई उनकी लेखन-यात्रा उन्हें अपनी माँ से विरासत में मिली सृजनशीलता का विस्तार है। उनकी प्रकाशित कृतियों में ‘गढ़ते शब्द’, ‘विद्रोह शब्दों का’ और ‘शब्दों को हद पता है’ जैसे चर्चित काव्य-संग्रह शामिल हैं। इसके अतिरिक्त उनकी रचनाएँ अनेक लघुकथा, कविता, लेख और हाइकु संकलनों में प्रकाशित हो चुकी हैं।
ममता सिंह देवा ने कविता, लघुकथा, कहानी, संस्मरण, लेख, हाइकु, कहमुकरी तथा बाल-साहित्य सहित अनेक विधाओं में उल्लेखनीय लेखन किया है। साहित्यिक सृजन के लिए उन्हें अनेक राष्ट्रीय एवं ऑनलाइन सम्मान प्राप्त हुए हैं। वे विभिन्न डिजिटल मंचों और YouTube चैनलों पर अपनी प्रभावशाली वाचन-शैली के माध्यम से भी साहित्य को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का कार्य कर रही हैं। कला की संवेदनशीलता और शब्दों की गहनता का अद्भुत संगम यही ममता सिंह देवा की रचनात्मक पहचान है। उनकी प्रत्येक कृति जीवन, समाज और मनुष्य के भीतरी संसार को नई दृष्टि से देखने का आमंत्रण देती है।

मेरी रचना को प्रकाशित करने के लिए बहुत-बहुत आभार सुरेश जी 😊