आश्वासन

न्यायालय में कटघरे में खड़ी एक गर्भवती महिला, सामने न्यायाधीश और गंभीर माहौल।

सुजाता चक्रवर्ती, बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

न्यायालय का विशाल कक्ष खचाखच भरा हुआ था, पर उस भीड़ में भी ऐसा सन्नाटा पसरा था कि सूई गिरने की भी आवाज़ सुनाई दे।

कटघरे में खड़ी नंदिता बार-बार अपने आँसू पोंछ रही थी, किंतु उसका चेहरा भावशून्य था। उसके बगल में उसका पति खड़ा था—झुकी हुई दृष्टि, मौन और अपराधबोध से भरा हुआ।

अभियोग स्पष्ट था—अवैध रूप से गर्भस्थ शिशु का लिंग परीक्षण और कन्या होने का पता चलने पर गर्भपात का प्रयास।

न्यायाधीश ने कुछ क्षण तक नंदिता को देखा। उस चेहरे पर अपराध से अधिक पीड़ा लिखी हुई थी।

उन्होंने धीमे स्वर में पूछा,

“तुम स्वयं एक स्त्री हो। ईश्वर ने तुम्हें माँ बनने का सौभाग्य दिया था। फिर अपनी ही संतान को जन्म लेने से पहले समाप्त करने का निर्णय कैसे लिया? क्या तुम्हारे हृदय में उसके लिए ममता नहीं जागी?”

नंदिता ने सिर उठाया।

उसकी आँखों में आँसू नहीं थे; शायद अब वे सूख चुके थे।

वह बोली,

“मान्यवर… यदि ममता न होती, तो मैं आज यहाँ खड़ी भी न होती।”

न्यायालय की हवा जैसे ठिठक गई।

“जिसे मैं अपनी कोख में लिए फिर रही थी, वह मेरे लिए कोई ‘भ्रूण’ नहीं थी। वह मेरी गुड़िया थी। मैंने उसका नाम भी सोच लिया था। उसके छोटे-छोटे कपड़ों के रंग तक चुन लिए थे।”

उसकी आवाज़ काँप गई।

“पर हर सुबह जब अख़बार खुलता, मेरी गुड़िया मुझसे सहमकर लिपट जाती…”

वह रुकी।

“कभी तीन महीने की बच्ची की चीख़ पढ़ती… कभी आठ वर्ष की बालिका का टूटा हुआ बचपन… कभी कॉलेज जाती युवती की अस्मिता लुटी हुई… कभी दहेज के लिए जलाई गई बहू… कभी अस्सी वर्ष की वृद्धा तक की लज्जा तार-तार होने का समाचार।”

उसने आँखें मूँद लीं। फिर सीधे न्यायाधीश की ओर देखते हुए बोली,

“मान्यवर… बताइए, एक माँ अपनी बेटी को किस उम्र में सुरक्षित माने? तीन महीने? तीन साल? तेरह साल? तीस साल? या अस्सी साल?”

कोर्ट में बैठे लोग सिर झुकाए सुन रहे थे।

पूरा न्यायालय निःशब्द था।

“मान्यवर, लोग कहेंगे मैं अपराधिनी हूँ। हाँ, हूँ। कानून के सामने सिर झुकाती हूँ। पर एक माँ के मन में उतरकर देखिए। मैं अपनी बेटी को जीवन नहीं, भय की विरासत देती। उसके जन्म के साथ मेरी रातों की नींद छिन जाती। वह पहली बार बाहर निकलती तो मेरा दिल काँपता। स्कूल जाती तो डर। कॉलेज जाती तो डर। नौकरी करती तो डर। विवाह होता तो दहेज-हत्या का डर।”

उसने अपने दोनों हाथ सीने पर रख लिए।

“एक माँ कब तक पहरा दे सकती है?”

अब उसकी आवाज़ में करुणा नहीं, एक गहरा प्रश्न था।

“सरकार ने बालिका भ्रूण-हत्या के विरुद्ध कानून तो बनाया है, यह काबिले-तारीफ़ है, पर क्या उनकी सुरक्षा के लिए पर्याप्त व्यवस्था की? केवल नारे बना देने से क्या बेटियाँ सुरक्षित हो गईं?”

“यदि सरकार, समाज और कानून मिलकर यह आश्वासन दें कि मेरी बेटी की देह, उसकी गरिमा, उसके सपने और उसका जीवन सुरक्षित रहेगा, तो मैं आज भी उसे इस संसार में लाने को तैयार हूँ।”

उसने न्यायाधीश की आँखों में देखा।

“क्या आप मेरी बेटी की रक्षा का आश्वासन देंगे, मान्यवर?”

न्यायाधीश के सामने संविधान खुला था, पर उसमें किसी माँ के भय का उपचार नहीं लिखा था।

उन्होंने धीरे से चश्मा उतार दिया। वे निःशब्द थे। उनकी आँखें झुकी हुई थीं।

नंदिता के होंठ काँपे।

“बस, मान्यवर… इसी असमर्थता ने मेरी ममता को अपराध बना दिया। मैं अपनी गुड़िया से इतना प्रेम करती हूँ कि उसे हर दिन मरते हुए देखने का साहस मुझमें नहीं था।”

उस दिन फैसला केवल एक मुकदमे का नहीं होना था। कटघरे में केवल एक दंपति नहीं खड़ा था। कटघरे में वह समाज भी खड़ा था, जिसने बेटियों को जन्म लेने से पहले ही उनका भविष्य आशंकाओं और असुरक्षा से भर दिया था।

न्यायालय में बैठे अनेक लोगों की आँखें नम थीं।

न्यायाधीश ने निर्णय सुनाने से पहले कहा,

“कानून कन्या भ्रूण-हत्या को कभी स्वीकार नहीं कर सकता। यह अपराध है और इसका दंड होगा। किंतु इस न्यायालय की दृष्टि में समाज भी निर्दोष नहीं है। जिस दिन हर बेटी बिना भय के जन्म ले सकेगी, उस दिन शायद किसी माँ के मन में ऐसा विचार जन्म ही नहीं लेगा।”

निर्णय लिखा गया।

लेकिन नंदिता का अंतिम प्रश्न अदालत की दीवारों से टकराकर आज भी गूँज रहा है—

“क्या कोई मेरी बेटी की सुरक्षा की गारंटी देगा?”


लेखिका के बारे में-

सुजाता चक्रवर्ती
समकालीन हिंदी साहित्य की संवेदनशील और सशक्त रचनाकार हैं। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में जन्मी सुजाता ने कहानी, लघुकथा, कविता और समसामयिक नारीवादी लेखन के माध्यम से अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, सामाजिक सरोकारों और स्त्री-अस्मिता के प्रश्नों को गहन संवेदना के साथ अभिव्यक्त करती हैं।उनकी रचनाएँ नवभारत, जनता से रिश्ता, हाइवे चैनल और छत्तीसगढ़ प्राइड सहित अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। ‘जिंदगानी’ (लघुकथा संग्रह), ‘वंदनवार’ (कविता संग्रह) तथा ‘अकेल्ला चलव’ (रवींद्रनाथ ठाकुर की काव्य रचनाओं का छत्तीसगढ़ी अनुवाद) उनकी सृजनात्मक विविधता और साहित्यिक प्रतिबद्धता के सशक्त प्रमाण हैं। उनकी लेखनी जीवन की सच्चाइयों को संवेदना, विचार और सहज अभिव्यक्ति के साथ पाठकों तक पहुँचाती है।
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