मैं हूँ न

खिड़की के पास खड़ा एक युवक मुस्कुराते हुए फोन पर बात कर रहा है, बाहर उगती सुबह उम्मीद का प्रतीक है।

सुरेश परिहार, पुणे

राघव को अब सुबह होने से डर लगने लगा था. अलार्म रोज़ बजता, लेकिन उठने की कोई वजह नहीं होती. कमरे की खिड़की महीनों से पूरी तरह नहीं खुली थी. मेज़ पर अधूरी किताबें, आधा भरा चाय का कप और दवाइयों की पत्तियाँ बिखरी रहतीं. मोबाइल पर लोगों की हँसती हुई तस्वीरें देखकर वह अक्सर सोचताक्या सचमुच दुनिया इतनी खुश है, या सब मेरी तरह अभिनय कर रहे हैं?
एक समय था जब उसके सपनों की कोई सीमा नहीं थी. नौकरी, दोस्त, योजनाएँ… सब कुछ था. फिर धीरे-धीरे लोग अपने-अपने जीवन में व्यस्त हो गए. फोन कम होते गए, मुलाकातें बंद हो गईं और एक दिन उसे एहसास हुआ कि उसके पास बातें करने के लिए कोई नहीं बचा.
रातें सबसे कठिन होती थीं.
वह छत पर जाकर देर तक आसमान देखता और मन ही मन कहता
अगर कल सुबह आँख न खुले, तो शायद किसी को ज़्यादा फर्क भी नहीं पड़ेगा.
मरना वह नहीं चाहता था. बस इस तरह जीना भी नहीं चाहता था.
एक साहित्यिक मंच पर उसकी मुलाकात रिद्धिमा से हुई. पहली बातचीत किसी कविता पर हुई थी. फिर किताबों पर, फिर मौसम पर… और धीरे-धीरे जीवन पर. रिद्धिमा कभी उसे समझाने की कोशिश नहीं करती थी. वह स़िर्फ सुनती थी.
एक रात उसने पूछा
आज इतने चुप क्यों हो?
राघव ने पहली बार सच लिखा
आज पूरा दिन किसी से बात नहीं हुई.
कुछ सेकंड बाद उसका जवाब आया
अब हो रही है.
बस चार शब्द.
लेकिन उन चार शब्दों ने उस रात का सन्नाटा तोड़ दिया.
दिन बीतते गए.
अब दोनों लगभग रोज़ बात करने लगे.
एक दिन रिद्धिमा ने कहा-एक काम करोगे?
क्या?
कल सुबह स़िर्फ दस मिनट टहलना. बस दस मिनट.
राघव हँस पड़ा.
इतने से क्या बदल जाएगा?
पता नहीं… लेकिन कमरे में बैठे रहने से तो कुछ नहीं बदल रहा.
अगली सुबह वह गया भी… और पाँच मिनट बाद लौट आया.
उसने मैसेज किया… बेकार था.
रिद्धिमा ने स़िर्फ इतना लिखा
ठीक है… कल फिर पाँच मिनट.
उसने कोई भाषण नहीं दिया.
धीरे-धीरे पाँच मिनट दस हुए.
दस मिनट बीस.
एक दिन टहलते हुए उसने पहली बार गौर किया कि सड़क किनारे अमलतास खिल आया है.
उस शाम उसने रिद्धिमा को उसकी तस्वीर भेजी.
रिद्धिमा ने जवाब दिया
लगता है तुम वापस देखने लगे हो.
कुछ सप्ताह बाद उसने नया नियम बनाया.
हर रात सोने से पहले तीन अच्छी बातें लिखनी हैं.
पहले दिन उसने लिखा… आज बारिश की खुशबू अच्छी लगी.
दूसरे दिन…
चाय आज सचमुच अच्छी बनी.
तीसरे दिन उसने बहुत देर तक स्क्रीन देखी.
फिर लिखा…
आज तुमने हँसाया.
रिद्धिमा ने जवाब में स़िर्फ एक मुस्कुराता हुआ इमोजी भेजा.
स़फर आसान नहीं था.
ऐसे भी दिन आते, जब राघव पूरे दिन बिस्तर से नहीं उठता.
कभी फोन नहीं उठाता….कभी कई-कई घंटों तक किसी संदेश का उत्तर नहीं देता.
एक शाम रिद्धिमा ने केवल इतना लिखा
आज बात नहीं करनी… तो मत करो. लेकिन खाना खाकर सोना.
उस दिन पहली बार राघव को महसूस हुआ कि किसी का साथ हमेशा शब्दों से नहीं होता.
कुछ महीने बीत गए….
अब कमरे की खिड़की रोज़ खुलने लगी थी.
मेज़ पर ताज़े फूल रखे रहते….रात की दवाइयाँ कम हो गई थीं.
उसकी आँखों के नीचे के काले घेरे भी हल्के पड़ने लगे थे.
एक दिन रिद्धिमा ने अचानक कहा….चैटिंग बंद करो… फोन करो.
अभी?
हाँ… अभी.
फोन मिलते ही दोनों कुछ देर चुप रहे.
फिर रिद्धिमा बोली
तुम रो सकते हो, पता है?
बस इतना सुनना था कि वर्षों से जमा बाँध टूट गया.
राघव देर तक रोता रहा.
उसने अपने डर, अकेलेपन, असफलताओं और उन रातों का ज़िक्र किया, जब उसे लगता था कि अब कुछ नहीं बचा.
रिद्धिमा बीच-बीच में स़िर्फ इतना कहती रही
हूँ…
सुन रही हूँ…
मैं हूँ न…
उस रात पहली बार उसे सलाह नहीं, सहारा मिला.
समय के साथ राघव बदल गया.
नहीं…
सच तो यह था कि वह बदल नहीं रहा था.
वह फिर से वही बन रहा था, जो कभी हुआ करता था.
अब वह सुबह इसलिए उठता था कि पार्क में चाय वाले अंकल से मुस्कुराकर नमस्ते कहना है.
ऑफिस जाते हुए रास्ते का वही गुलमोहर देखना है.
शाम को रिद्धिमा से दिन भर की छोटी-छोटी बातें साझा करनी हैं.
और सबसे ज़रूरी…
उसे अब अगले दिन का इंतज़ार रहने लगा था…….
एक शाम रिद्धिमा ने पूछा
अगर मैं तुमसे एक बात पूछूँ तो सच-सच बताओगे?
हाँ….अब भी कभी मौत की दुआ माँगते हो?
राघव ने खिड़की खोली….सामने ढलते सूरज की लालिमा पूरे कमरे में फैल गई थी.
वह मुस्कुराया.
नहीं…
क्यों?
उसने धीरे से कहा-क्योंकि अब जीने की वजह है.
फोन के उस पार कुछ पल की खामोशी रही.
फिर रिद्धिमा की हल्की-सी हँसी सुनाई दी.
और उस हँसी में राघव को पहली बार लगा…शायद प्रेम का अर्थ किसी की ज़िंदगी बदल देना नहीं होता.
प्रेम वह हाथ है, जो अँधेरे में भी छूटता नहीं.
और कभी-कभी किसी टूटे हुए इंसान को बचाने के लिए पूरी दुनिया नहीं, स़िर्फ तीन शब्द क़ाफी होते हैं
मैं हूँ न.
इन रचनाओं को भी पढ़िए
हस्ताक्षर…
दर्द के पार
मैं हूँ न
मुखौटा
आश्वासन
सपने सिसक रहे हैं
स्पैम फ़ोल्डर

6 thoughts on “मैं हूँ न

  1. टूटते हुए को संभाल लेना इस जहां की सबसे खूबसूरत नेमत है🌸 प्यारी कहानी

  2. , पोथी पढ़ी पढ़ी जग मुआ पंडित भया न कोय,, ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।।।

    Nice article 👍

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