सपने सिसक रहे हैं

अँधेरी रात में टिमटिमाते तारे, नदी किनारे अकेली नाव और दूर जलता एक दीपक, उम्मीद का प्रतीक।

रेखा हजारिका, लखीमपुर

उथल-पुथल भरे समय के शोर में
फिर भी
अँधेरी रात में
तारे अभी भी जल रहे हैं,
टिमटिमाते हुए।

गरम आँसुओं से
मैं लिखती जा रही हूँ
आने वाले समय का
जुगनू-गीत।

डूब गया सूरज,
रात का पर्दा उतरा।
दूर किसी किनारे पर
एक दिया बुझ गया।

साथ बसे सपने
अब सिर्फ़ यादें हैं।

नदी की धारा रुकी नहीं,
पर नाव अकेली है।

अस्त हो गया दिन,
पर मन में उजाला बाकी है।

क्योंकि हर अस्त के बाद
फिर से एक सवेरा आता है।

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