
पूनम सिंह वत्सला, जमशेदपुर
दिल में ख़्वाहिश जो उनसे मोहब्बत की मैंने,
वह कब बनी इबादत, ये समझ न सकी।
था सुकून मोहब्बत का मुझको, ऐ जानेमन,
कब वह बन गई आदत, ये समझ न सकी।
रात की तन्हाइयों में जब कभी भी मैं होती,
उनकी यादें बनी क़यामत, ये समझ न सकी।
न जाने क्यों, कब इस क़दर रुसवा हुए हम,
सामने मौत-सी आफ़त, ये समझ न सकी।
कसमें खाई थीं हमने उम्र भर साथ रहने की,
किससे करूँ मैं शिकायत, ये समझ न सकी।
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