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मोहब्बतें

मोहब्बत में बिछड़न और तन्हाई का दर्द व्यक्त करती हिंदी कविता 'मोहब्बतें'

पूनम सिंह वत्सला, जमशेदपुर

दिल में ख़्वाहिश जो उनसे मोहब्बत की मैंने,
वह कब बनी इबादत, ये समझ न सकी।

था सुकून मोहब्बत का मुझको, ऐ जानेमन,
कब वह बन गई आदत, ये समझ न सकी।

रात की तन्हाइयों में जब कभी भी मैं होती,
उनकी यादें बनी क़यामत, ये समझ न सकी।

न जाने क्यों, कब इस क़दर रुसवा हुए हम,
सामने मौत-सी आफ़त, ये समझ न सकी।

कसमें खाई थीं हमने उम्र भर साथ रहने की,
किससे करूँ मैं शिकायत, ये समझ न सकी।

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