
रुचि अग्रवाल, सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल)
जीवन एक ऐसी यात्रा है, जिसमें सुख और दुख दोनों साथ-साथ चलते हैं। कुछ खुशियाँ ऐसी होती हैं जो हमें जीवनभर मुस्कुराने का कारण देती हैं, तो कुछ दर्द ऐसे होते हैं जो बरसों बाद भी दिल के किसी कोने में चुपचाप बसे रहते हैं। ऐसे दर्द को न तो आसानी से किसी से कहा जा सकता है और न ही पूरी तरह सहा जा सकता है। वह दर्द शब्दों से परे होता है, लेकिन उसकी मौजूदगी हर दिन महसूस होती है।
कभी किसी अपने का बिछड़ जाना, कभी विश्वास का टूट जाना, कभी अधूरे रह गए सपने, या कभी किसी रिश्ते का अचानक समाप्त हो जाना ये सभी ऐसे घाव छोड़ जाते हैं जो दिखाई नहीं देते, लेकिन भीतर बहुत गहराई तक दर्द देते हैं।
अक्सर लोग कहते हैं कि समय हर घाव भर देता है। यह बात काफी हद तक सही भी है, लेकिन केवल समय ही काफी नहीं होता। दर्द से बाहर निकलने के लिए हमें खुद भी कुछ कदम उठाने पड़ते हैं। सबसे पहले यह स्वीकार करना ज़रूरी है कि दर्द हमारे जीवन का एक हिस्सा है। जितना हम उससे भागने की कोशिश करते हैं, वह उतना ही हमारा पीछा करता है। लेकिन जब हम उसे स्वीकार कर लेते हैं, तब उससे उबरने की प्रक्रिया शुरू होती है।
दर्द भरी यादों को पूरी तरह मिटाना संभव नहीं होता, लेकिन उनके प्रभाव को कम ज़रूर किया जा सकता है। इसके लिए अपने मन को नई दिशाओं में व्यस्त रखना आवश्यक है। कोई नया शौक अपनाना, किताबें पढ़ना, संगीत सुनना, लेखन करना, प्रकृति के बीच समय बिताना या अपने प्रिय लोगों के साथ समय गुज़ारना मन को धीरे-धीरे संतुलन की ओर ले जाता है।
कई बार हम अपने दर्द को छिपाने की कोशिश करते हैं। बाहर से मुस्कुराते रहते हैं, लेकिन भीतर से टूटते रहते हैं। ऐसे समय में किसी भरोसेमंद व्यक्ति से अपने मन की बात साझा करना भी राहत देता है। जब मन का बोझ शब्दों में बाहर आता है, तो दर्द का भार थोड़ा हल्का हो जाता है।
एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि स्वयं को दोष देना बंद करना चाहिए। जीवन में हर घटना हमारे नियंत्रण में नहीं होती। कुछ परिस्थितियाँ ऐसी होती हैं जिन्हें हम बदल नहीं सकते, लेकिन उनके प्रति अपना दृष्टिकोण अवश्य बदल सकते हैं। जब हम यह समझ लेते हैं कि अतीत को बदला नहीं जा सकता, तब वर्तमान को बेहतर बनाने की शक्ति हमारे भीतर जन्म लेती है।
दर्द को भूलने का सबसे अच्छा तरीका उसे मिटाना नहीं, बल्कि उसके साथ जीना सीखना है। जब हम अपने घावों को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि अपने अनुभव का हिस्सा मान लेते हैं, तब वही दर्द हमें मज़बूत बनाना शुरू कर देता है।
याद रखिए, जीवन कभी एक जैसा नहीं रहता। जिस रात का अंधेरा सबसे गहरा लगता है, उसी के बाद सबसे सुंदर सुबह भी आती है। इसलिए यदि आज कोई दर्द आपको भीतर से तोड़ रहा है, तो विश्वास रखिए कि यह समय भी बीत जाएगा।
ज़िंदगी का नाम ही आगे बढ़ना है। कुछ यादें कभी नहीं जातीं, लेकिन समय के साथ उनका दर्द कम हो जाता है। और एक दिन हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो महसूस होता है कि जिस दर्द ने कभी हमें रुलाया था, उसी ने हमें जीवन की सबसे बड़ी सीख भी दी थी।
क्योंकि कुछ दर्द भुलाए नहीं जाते, लेकिन उनसे आगे बढ़ना ज़रूर सीखा जा सकता है।
इन रचनाओं को भी पढ़िए
हस्ताक्षर…
दर्द के पार
मैं हूँ न
मुखौटा
आश्वासन
सपने सिसक रहे हैं
स्पैम फ़ोल्डर

4 thoughts on “दर्द के पार”