
मधु मिश्रा, ओडिशा
अनिकेत बाबू, मैं यह क्या सुन रही हूँ? आप जगन्नाथ जी की पेंशन फाइल पर हस्ताक्षर करने के लिए उन्हें बेवजह परेशान कर रहे हैं! उनके सारे दस्तावेज़ पूरे और सही हैं, फिर यह अनावश्यक विलंब क्यों? मुझे तत्काल इसका कारण बताइए।”
दीप्ति मैडम की तेज़ आवाज़ पूरे कार्यालय में गूँज उठी।
अनिकेत सकपका कर बोला, “मैडम… वो… कुछ दूसरी फाइलों में व्यस्त था, इसलिए…”
“अनिकेत जी…” दीप्ति मैडम ने उसकी बात बीच में ही रोक दी, “जहाँ तक मेरी जानकारी है, इस समय इस कार्यालय में जगन्नाथ जी की आवश्यकता से अधिक महत्वपूर्ण कोई फाइल नहीं है। जिस बुज़ुर्ग की आजीविका उसकी पेंशन पर टिकी हो, उसके लिए हर दिन मायने रखता है।”
अनिकेत ने झेंपते हुए कहा, “क्षमा कीजिए, मैडम… मैं अभी देखता हूँ।”
उसने फाइल निकाली, औपचारिकता निभाने के लिए कुछ पन्ने इधर-उधर पलटे और अंततः हस्ताक्षर कर फाइल मुख्य कार्यालय भेज दी।
दीप्ति मैडम उसकी ओर देखती हुई शांत, किंतु दृढ़ स्वर में बोलीं, “अनिकेत जी, मैं आपसे एक सीधी बात कहना चाहती हूँ। सरकार हमें ईमानदारी से काम करने के लिए पर्याप्त वेतन देती है। फिर ‘खर्चा-पानी’ की अपेक्षा क्यों? कभी सोचा है कि आपके एक हस्ताक्षर के इंतज़ार में कोई बुज़ुर्ग कितनी बार इस दफ़्तर के चक्कर लगाता होगा… कितनी बार उम्मीद लेकर आता होगा और टूटा हुआ मन लेकर लौट जाता होगा?”
अनिकेत की नज़रें अनायास बरामदे की ओर उठ गईं।
जगन्नाथ जी के काँपते हाथ अपनी छड़ी को थामे हुए खड़े थे। जैसे ही उन्हें पता चला कि उनकी पेंशन की फाइल आगे भेज दी गई है, उनके झुर्रियों भरे चेहरे पर ऐसी संतोषभरी मुस्कान खिल उठी, मानो बरसों बाद किसी ने उनके सम्मान पर भी हस्ताक्षर कर दिए हों।
उस क्षण अनिकेत को पहली बार एहसास हुआ कि काग़ज़ पर किया गया हर हस्ताक्षर केवल एक सरकारी प्रक्रिया नहीं होता; कभी-कभी वह किसी की आख़िरी उम्मीद पर लिखा गया भरोसा भी होता है।
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बढ़िया 👏👏
तहे दिल से आभार मौसमी 💐🙂❣️
सुरेश जी मेरी रचना प्रकाशन के लिए आपको हृदय से आभार 💐🙏
वाह 👌 बहुत बढ़िया
बहुत खूब👌
Bahut badhiya.madhu.