
सुरेश परिहार, पुणे
राघव ने कभी सोचा भी नहीं था कि एक अनजाने में निकला हुआ शब्द दो दिनों की इतनी लंबी खामोशी बन जाएगा.
उस शाम दोनों हमेशा की तरह बात कर रहे थे. बातें हल्की-फुल्की थीं, हँसी-मज़ाक चल रहा था. उसी दौरान राघव ने मज़ाक में कुछ ऐसा कह दिया, जो उसके लिए शायद एक सामान्य-सा वाक्य था. लेकिन रिद्धिमा के लिए नहीं.
रिद्धिमा वैसे भी बहुत संवेदनशील थी. छोटी-सी बात भी उसके दिल तक पहुँच जाती थी. राघव की कही उस एक बात ने भी वही किया. उसने उसी पल बात तो खत्म कर दी, लेकिन उसके बाद जैसे शब्द भी खत्म हो गए.
राघव ने पहले तो सोचा… थोड़ी देर में सब ठीक हो जाएगा.
लेकिन उस रात न कोई गुड नाइट आया और न अगली सुबह गुड मॉर्निंग.
तभी उसे पहली बार एहसास हुआ कि इंसान की आदत कितनी चुपचाप ज़िंदगी का हिस्सा बन जाती है….पहले दिन उसने कई बार फोन उठाया. चैट खोली. कुछ लिखा…
सॉरी…फिर मिटा दिया.
सोचा, शायद अभी उसका गुस्सा कम नहीं हुआ होगा.
उधर रिद्धिमा भी चैन में नहीं थी.
वह बार-बार मोबाइल उठाती, राघव का नाम स्क्रीन पर ढूँढ़ती और फिर खुद को समझा देती, पहले वही बात करेगा. असल में, उसे गुस्सा राघव से कम और उस शब्द से ज़्यादा था, जिसने उसे भीतर तक दुखी कर दिया था.
दोनों अपने-अपने अहंकार से नहीं, अपनी-अपनी भावनाओं से हार रहे थे.
पहला दिन किसी तरह निकल गया…..दूसरे दिन बेचैनी और बढ़ गई.
राघव ऑफिस में बैठा था, लेकिन काम पर ध्यान नहीं था. खाना खाते समय उसे याद आया कि इसी समय रिद्धिमा हर रोज़ पूछती थी, खाना खा लिया?
उस दिन खाना खाने का मन नहीं हुआ.
उधर रिद्धिमा ने शाम को बारिश देखी, तो अनायास मुस्कुरा दी. हर बारिश में राघव ज़रूर कहता था, चलो, आज आप भीगो पानी में …उसके होंठों पर मुस्कान आई भी और उसी पल आँखें भीग गईं.
किसी रिश्ते की सबसे बड़ी सज़ा शायद यही होती है कि दोनों एक-दूसरे को याद कर रहे हों, लेकिन दोनों ही चुप हों….दूसरी रात राघव से रहा नहीं गया.
उसने स़िर्फ मैसेज भेजा. आप ऐसे ही रहोगी अब …कल सुबह मुझे बात करनी है. मैसेज पर समझा नहीं पाउंगा.. फिर भी उसने लिखा..
मुझे नहीं पता मैंने जो कहा, उससे तुम्हें कितना दुख पहुँचा. लेकिन इतना ज़रूर जानता हूँ कि तुम्हें दुखी करना कभी मेरी मंशा नहीं थी. अगर हो सके… तो मुझे म़ाफ कर देना.मैसेज भेजने के बाद उसने फोन एक तऱफ रख दिया.
सुबह मोबाइल की घंटी बजी.स्क्रीन पर नाम था रिद्धिमा.
राघव ने बिना एक पल गंवाए फोन उठा लिया.
दूसरी तऱफ कुछ सेकंड तक स़िर्फ खामोशी थी…..फिर रिद्धिमा धीमे से बोली
तुम्हें पता है… तुम्हारी वही एक बात मुझे कितनी बुरी लगी थी?
हाँ…राघव ने बहुत धीरे कहा, और इन दो दिनों में शायद उससे भी ज़्यादा बुरा मुझे खुद लगा है…..कुछ पल दोनों चुप रहे….फिर न जाने कैसे दोनों हँस पड़े.
शायद इसलिए कि दोनों समझ चुके थेझगड़ा किसी बात का नहीं था, बल्कि उस इंसान का था जिसे खोने का डर दोनों को बराबर था….उस दिन के बाद उन्होंने एक छोटा-सा वादा किया…. अगर कभी कोई बात बुरी लगेगी, तो चुप रहकर दूर नहीं होंगे. बैठकर बात करेंगे. क्योंकि रिश्ते खामोशी से नहीं, बातचीत से बचते हैं.आज भी कभी-कभी दोनों उस दो दिन की चुप्पी को याद करते हैं.
रिद्धिमा मुस्कुराकर कहती है, याद है… स़िर्फ दो दिन बात नहीं हुई थी.
राघव हँसते हुए जवाब देता है, दो दिन कहाँ… मुझे तो लगा था जैसे दो साल बीत गए हों.और फिर दोनों उसी तरह खिलखिलाकर हँस पड़ते हैं…
जैसे उन दो दिनों की खामोशी कभी उनके बीच आई ही न हो….
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अति सुन्दर हृदयस्पर्शी कहानी , संपादक महोदय आदरणीय श्री सुरेश परिहार को हार्दिक बधाई एवं अशेष शुभकामनाएं 👌🌷🙏🥰।
आहा वाली ending ❤️❤️ प्यार में छोटे मोटे झगड़े भी मीठे लगते हैं अच्छा लिखा👌
वाह
बहुत रोचक, हृदयस्पर्शी कहानी सर
बेहद रोचक मोड़ 👌