पापा

अपने छोटे बच्चे का हाथ थामे मुस्कुराते हुए एक पिता, जो सुरक्षा, प्रेम और विश्वास का प्रतीक है।

डॉ. अनामिका दुबे निधि, मुंबई

जिनकी आहट से मेरे हौसले जग जाते हैं,
मेरे पापा ही तो हर दर्द को सह जाते हैं।

धूप चाहे कितनी भी तेज़ क्यों न हो राहों में,
अपने साए में मुझे हर पल बचा लेते हैं।

रब से पहले जो मेरी हर ख़्वाहिश पहचानें,
बिन कहे आँखों के आँसू भी पढ़ लेते हैं।

मेरी छोटी-सी ख़ुशी में जो जहाँ पा लेते हैं,
अपने सपनों को मगर चुपचाप भुला देते हैं।

ख़ुद तो काँटों भरे रास्तों पर चलते रहते हैं,
मेरे क़दमों में हमेशा ही दुआ रखते हैं।

मैं गिरूँ लाख दफ़ा, हाथ नहीं छोड़ेंगे,
मेरे पापा ही मुझे जीना सिखा देते हैं।

‘निधि’ दौलत से नहीं, प्यार से घर रौशन है,
ऐसे रिश्ते ही तो जन्नत का पता देते हैं।

माँ अगर घर की दुआ है, तो सहारा हैं पिता;
सर पर हो हाथ जिनका, वो ख़ुदा-सा हैं पिता।

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