पिता
कुर्सी
घर के एक कोने में रखी वह पुरानी कुर्सी आज भी केवल लकड़ी का एक फर्नीचर नहीं लगती। वह पिता की आदतों, उनके अनुशासन, उनके स्नेह और पूरे परिवार की अनगिनत यादों की साक्षी है। इस मार्मिक संस्मरण में एक बेटी अपनी स्मृतियों के सहारे उस खाली कुर्सी में आज भी अपने पापा की मुस्कुराती हुई छवि देखती है। यह कहानी हर उस व्यक्ति के दिल को छू जाएगी, जिसने अपने पिता को खोया है या उनकी यादों को संजोए रखा है।
पिता लिखे नहीं जाते
हम अक्सर पिता को केवल एक मजबूत व्यक्तित्व के रूप में देखते हैं, लेकिन उनके भीतर भी भावनाएँ, डर और थकान होती है। यह लेख एक बेटे के उस एहसास की कहानी है, जब उसने पहली बार अपने पिता को रोते हुए देखा।
पिता : बिना दुनिया अधूरी
पिता केवल परिवार का आधार नहीं, बल्कि वह मौन शक्ति हैं जो अपने सपनों से पहले बच्चों की खुशियों को चुनते हैं। यह कविता पिता के प्रेम, त्याग और अपनत्व को समर्पित है।
आत्मा को स्पर्श करती “स्मृति नाद”
“स्मृति नाद” अपूर्वा की ऐसी काव्य कृति है, जो स्मृतियों, रिश्तों और भावनाओं के गहरे संसार को सजीव करती है। इसमें मां, पिता और बचपन से जुड़ी अनुभूतियां इतनी सजीव हैं कि पाठक केवल पढ़ता नहीं, बल्कि उन्हें जीने लगता है।
कविताएँ मेरी हथेली पर
यह कविता जीवन की हथेली पर उकेरी गई अनुभूतियों का चित्र है। माँ, पिता, प्रेम और समाज चारों मिलकर मनुष्य के अस्तित्व की रेखाएँ बनाते हैं। कविताएँ यहाँ केवल रचना नहीं, बल्कि पहचान और पूर्णता का प्रतीक हैं।
मेहनत और सफलता
मेहनत ही सफलता की सच्ची कुंजी है। चाहे चींटी का निरंतर प्रयास हो या कुम्हार, किसान, मजदूर और माता-पिता का श्रम हर जगह यही सच सामने आता है कि लगन और परिश्रम से ही जीवन को आकार मिलता है। जो लक्ष्य पर टिके रहते हैं, वही अंततः सफल होते हैं।
“कंधों पर दुनिया, आँखों में समंदर”
पुरुष ज़ुबां से कम बोलते हैं, पर उनकी आँखें सब कह देती हैं. प्यार, फ़िक्र, थकान और छुपी हुई नमी। ज़िम्मेदारियों में दबे हुए भी वे घर की जड़ बनकर सबकी खुशी में खुद को भूल जाते हैं।
मैं कब से थी नीर की बदरी
कविता में एक स्त्री अपनी जीवन-यात्रा को स्मरण करती है। वह बताती है कि बचपन में वह माता-पिता की दुलारी थी—माँ की गुड़िया और पिता की आँखों की पुतली। आँगन और गलियों में सखियों संग खेलते-खेलते उसने प्रेम और रिश्तों को सँजोया।
फिर सपनों से भरे मन के साथ विवाह के बाद विदा हुई, नए रिश्तों की डोर बाँधी। परंतु आगे चलकर उसका जीवन वैसा सुखद नहीं रहा। पवित्र दांपत्य बंधन टूट गया, कई रातें अधूरी रह गईं। उसकी आँखें बरसती रहीं, पर मन का आँगन सूखा पड़ा रहा। इस कविता में बचपन की निश्छलता, विवाह का सपना और फिर विरह तथा विफलता की वेदना—तीनों भाव गहराई से व्यक्त हुए हैं।
हश्र..
आज वही देवतुल्य बेटा, जिसके जन्म पर पूरा घर-आँगन गूँज उठा था, सरे-बाज़ार नंग-धड़ंग खड़ा है—इज़्ज़त के नाम पर। जिस बेटे के लिए माँ ने मन्नतों के धागे बाँधे थे, दादी ने मिठाइयाँ बाँटी थीं और बधाई गीत गाए थे, आज वही बेटे के संस्कार समाज के सामने नंगे खड़े हैं।
कभी पोते के स्वागत में पतोहू को चुनरी ओढ़ाई गई थी, बुआ ने देहरी पर नेग के लिए अड़ गई थी, भाभी के कंगन उतरवाए गए थे और दादा ने सातों पत्तलों पर भोज करवा शान से जश्न मनाया था। किन्नरों को बुलाकर डैडी ने चाँदी के सिक्के उछाले थे। यह सब उस इकलौते कुलदीपक के नाम पर हुआ, जिसे देवपुत्र की तरह पूजा गया।
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