रीता मिश्रा तिवारी की लंबी कहानी का चौथा भाग

रीता मिश्रा तिवारी, भागलपुर
“मुखियान, तीन प्याली चाय लाओ..!”
“भौजाई..! साथ में पकौड़े भी। कहाँ गए थे तड़के उठकर..?”
“श्याम बाबू..! कितने पकौड़े खाओगे भाई..? चने का साग खाया जाए आज, क्या कहते हो..?”
“साग-वाग रहने दे, ये बता तुम्हारे साथ ये कौन है..?”
“तूने पूछा न, तड़के उठकर कहाँ गया था.. तुम्हारी कोठी देखने गया था। ज़रा तुम ही पहचानो कौन है ये..!”
“आँखें सही होतीं तो पूछता ही क्यों..!”
एक अरसे बाद पोते से मिलकर श्याम बाबू खुशी से झूम रहे थे। अपने काँपते हाथों से बार-बार पोते को आशीर्वाद दे रहे थे और बलैयाँ ले रहे थे।
“बेटा..! कुछ भी अब साफ दिखाई नहीं देता।”
“दादू.. सबसे पहले आपका नया चश्मा बनवाऊँगा..! ये देखिए, अमेरिका से आपके ऐनक के लिए फ्रेम लेकर आया हूँ, स्टाइल वाला..।”
“बुढ़ापे में क्या स्टाइल, तू आ गया बस और कुछ नहीं चाहिए। मैं ऐसे ही देखना तंदुरुस्त हो जाऊँगा।
अब समझा मुखिया.. इसलिए तुम चने के साग की बात कर रहे थे। रवि ने बताया होगा, है न..? बेटा रवि..! चल घर चलते हैं।”
“वाह दोस्त.. पोते के आते ही एक ही पल में कर दिया न पराया..”
“दादू..! सालों से बंद पड़ा है घर। जंगलों ने साम्राज्य फैला रखा है। जब तक उनका सफाया नहीं करते, तब तक आप यहीं रहिए।”
सप्ताह भर बाद दोनों दादा-पोता अपनी कोठी में विराजे।
अब आँगन में खुशियाँ ही खुशियाँ थीं। गुलमोहर पर चिड़ियाँ चहचहाती थीं। तुलसी चौरे में तुलसी लहलहाती झूम रही थी।
मुखिया बाबा के साथ-साथ रोज लोगों का आना-जाना लगा रहता था।
समय के तो पंख लगे होते हैं। किसी की परवाह किए बिना तेजी से उड़ रहा था। महीना दर महीना, साल बीत गया।
रवि को अपनी कंपनी के सेटअप में सफलता हासिल हुई। विदेश से कई अफसर आकर उसके काम की सराहना और तारीफ़ की। कभी भी किसी तरह की कोई भी जरूरत पड़ने पर मदद करने का वादा करके वापस लौट गए।
काम के सिलसिले में रवि का भागलपुर आना-जाना लगा रहता था। वैसे अधिकतर काम लैपटॉप से ही होता था।
दादू के स्वास्थ्य पर रवि के आने से गहरा असर हुआ। हाथों का कंपन और कमजोर दृष्टि अब सही हो गया था। व्यस्तता के बावजूद रवि दादू का खूब ख्याल रखता था.. खाना, दवाई, सब समय पर।
श्याम बाबू अपनी जवानी की कहानियाँ सुनाते, खूब हँसते, मनपसंद का खाना बनवाते-खाते.. मस्ती-मौज में दिन गुजर रहा था।
एक दिन जब रवि लौटकर आया तो दादू को उदास दीवारों को निहारते देखा।
“दादू, उदास मत होइए। कुछ महीने बस, फिर देखना पहले जैसी ही कोठी चमकेगी, वही रौनक होगी..।”
“वो बात नहीं है रवि..!”
“फिर क्या बात है दादू.. बताइए न..!”
दादू ने हमेशा की तरह बीच आँगन में लगे तुलसी के पौधे को देखा और कहा, “बेटा, बुढ़ापे में जड़ें उखाड़कर दूसरी मिट्टी में नहीं लगाई जातीं; इसी मिट्टी में एक दिन हमें मिल जाना है।”
“ऐसा क्यों कह रहे हैं दादू..!”
“बेटा, वो इसलिए कि एक बार इनकार किया हमने, फिर कभी दोबारा पलटकर नहीं देखा..!
उसे बड़ा करने में मैंने कोई कमी नहीं छोड़ी थी। जब जो चाहा दिया, जो करना चाहा करने दिया। कमी कहाँ रह गई। पैसे के साथ-साथ अपनों के लिए वक्त भी कमाना पड़ता है बेटे..!
अब इन बूढ़ी हड्डियों में ताकत नहीं बची है। इन आँखों से इंतजार अब नसीब नहीं।”
श्याम बाबू रवि को एक कमरे में ले जाकर एक संदूक खोलने को कहा। उसमें बच्चों के कपड़े, खिलौने, किताबें और भी कई सारी चीजें रखी थीं।
“ये सब मोहन के छुटपन का है। तुम्हारी दीदा सहेजकर रखती थी। अंतिम समय में इन्हीं चीजों को अपने आस-पास रखे रहती थी।
ये गुड्डा देख रहे हो.. मोहन नाम रखा था इसका। सीने से लगाए रहती थी।
ये देखो गुल्लक.. मोहन ने अपने पैसों से खरीदकर मुझे दिया था। ये कहकर कि, ‘अम्मा, आप जेब से पैसे लेती हैं। अब से इसमें पैसे रखा करो बाबा।’ तब वो दस साल का था।
दो साल का था। एक दिन टीवी पर क्रिकेट खेलते सचिन तेंदुलकर को देखा, जिद पकड़ ली। अपनी तोतली जुबान से रटता रहा.. ‘बैट चाहिए, मुझे भी क्रिकेट खेलना है..!'”
श्याम बाबू प्लास्टिक का बैट निकालकर चूमने लगे। उनकी आँखों से झर-झर आँसू बह रहे थे।
“दादू..! हूँ न मैं.. क्या कोई नहीं हूँ मैं आपका..?”
“तू तो लखतेजिगर है रे..
बेटा..! यह घर, जहाँ पलकर, खेलकर वो बड़ा हुआ, यहाँ की हर दीवार उसकी यादों से भरी है।
उसे गुलमोहर का फूल बहुत पसंद था। उसके लिए मैंने भागलपुर से पौधा लाकर आँगन में लगा दिया। तब वो पाँच साल का था।
एक बात पूछूँ..?”
“पूछिए न दादू..”
“क्या उसे अपना देश, अपनी मिट्टी, अपने घर-परिवार की याद नहीं आती..? क्या वह अपने घर कभी वापस नहीं आएगा…?”
