
सुरेश परिहार, लाइव वायर न्यूज़, पुणे
रिश्ते केवल प्रेम से नहीं चलते, वे विश्वास, सम्मान और समय पर किए गए संवाद की नींव पर टिके होते हैं। प्रेम दिलों को जोड़ता है, लेकिन विश्वास उन्हें संभालकर रखता है। और जब संवाद की डोर ढीली पड़ने लगती है, तो सबसे मज़बूत रिश्तों में भी ख़ामोशियाँ घर करने लगती हैं।
कभी-कभी एक छोटा-सा शब्द, एक अनजाने में कही गई बात या एक क्षणिक चूक किसी अपने के मन में ऐसा दर्द जगा देती है, जिसका अंदाज़ा कहने वाले को भी नहीं होता। कुछ शब्द सुनने में साधारण लगते हैं, लेकिन वे किसी के अतीत के ऐसे ज़ख्मों को छू जाते हैं, जिन्हें समय भी पूरी तरह भर नहीं पाता।
राघव और रिद्धिमा के बीच भी कुछ ऐसा ही हुआ।
एक बातचीत के दौरान राघव के मुँह से शायद ऐसा कोई शब्द निकल गया, जिसने रिद्धिमा के मन में वर्षों से दबे दर्द को फिर से जीवित कर दिया। समस्या केवल उस शब्द की नहीं थी, बल्कि उससे जुड़ी उन स्मृतियों की थी, जिन्हें वह बहुत पीछे छोड़ देना चाहती थी। कभी-कभी वर्तमान की एक छोटी-सी घटना, अतीत के अनगिनत दर्द एक साथ लौटा लाती है।
रिद्धिमा स्वभाव से बेहद संवेदनशील थी। वह किसी भी लड़की के साथ होने वाला अन्याय सुनकर ही बेचैन हो जाती थी। किसी की आँखों में आँसू देखना उसके लिए आसान नहीं था। ऐसे में जब उसे लगा कि वही पीड़ा कहीं उसके अपने जीवन को छू गई है, तो उसका भीतर तक हिल जाना स्वाभाविक था।
फिर भी वह पूरी तरह आश्वस्त नहीं थी। उसके मन में लगातार एक द्वंद्व चल रहा था।
“क्या मैंने सचमुच वही सुना था…? या फिर मैं गलत समझ बैठी? अगर मैंने सही सुना, तो राघव ने ऐसा क्यों कहा? और अगर मैंने गलत सुना… तो फिर यह बेचैनी क्यों खत्म नहीं हो रही?”
इन अनगिनत सवालों ने उसके मन को भीतर ही भीतर जकड़ लिया था।
राघव ने उससे कहा था कि समय आने पर वह अपनी बात स्पष्ट करेगा और अपना पक्ष रखेगा।
रिद्धिमा ने विश्वास किया…
वह इंतज़ार करती रही…
एक दिन…
फिर दूसरा दिन…
लेकिन उन दो दिनों में समय तो आगे बढ़ता रहा, पर उनके बीच की दूरी भी उतनी ही बढ़ती चली गई। कभी घंटों बातें करने वाले दो लोग अब एक-दूसरे के सामने होते हुए भी जैसे बहुत दूर खड़े थे।
रिद्धिमा पहले से कहीं अधिक शांत हो गई थी।
वह बोलती तो थी, लेकिन केवल ज़रूरत भर।
मुस्कुराती भी थी, लेकिन उसकी मुस्कान अब आँखों तक नहीं पहुँचती थी।
उसके भीतर जैसे कोई लगातार रो रहा था।
एक दिन राघव ने उससे पूछा—
“क्या आप अब हमेशा ऐसे ही रहने वाली हैं…? नाराज़… और बुझी-बुझी-सी?”
रिद्धिमा चाहती तो उसी क्षण सब कुछ कह सकती थी।
अपने मन की हर उलझन, हर डर और हर शिकायत उसके सामने रख सकती थी।
लेकिन उसने ऐसा नहीं किया।
उसे डर था कि कहीं उसकी बातें राघव को चोट न पहुँचा दें। कहीं ऐसा न हो कि वह स्वयं ही उसके दर्द का कारण बन जाए।
इसलिए उसने अपने आँसुओं की तरह अपने शब्दों को भी भीतर ही रोक लिया।
उसने ख़ामोशी को अपना उत्तर बना लिया।
लेकिन उसके मन का एक कोना बार-बार एक ही सवाल पूछता रहा—
“क्या राघव ने सचमुच मेरी ख़ामोशी को समझने की कोशिश की? क्या उसने एक बार भी महसूस किया कि मैं केवल नाराज़ नहीं हूँ… मैं भीतर से टूट रही हूँ?”
जीवन में व्यस्तताएँ सबके पास होती हैं।
ज़िम्मेदारियाँ भी कम नहीं होतीं।
लेकिन जब किसी रिश्ते में कोई अनकहा दर्द जन्म लेने लगे, तब थोड़ी-सी बातचीत, कुछ पल साथ बैठना और एक सच्चा स्पष्टीकरण कई टूटते हुए रिश्तों को बचा सकता है।
जब मन सवालों से भर जाता है, तो इंसान बदलने लगता है।
वह पहले की तरह हँस नहीं पाता।
बातें करते हुए भी कहीं खोया रहता है।
उसकी आँखें बहुत कुछ कहती हैं, लेकिन होंठ चुप रह जाते हैं।
रिद्धिमा के साथ भी यही हो रहा था।
उसे सबसे अधिक पीड़ा इस बात की थी कि जिस स्पष्टीकरण की उसे प्रतीक्षा थी, वह अब तक नहीं आया था।
फिर भी उसने हार नहीं मानी।
उसने कई बार राघव को फ़ोन किया।
हर बार मन में यही उम्मीद थी कि शायद आज बात हो जाएगी…
शायद आज सारी गलतफ़हमियाँ दूर हो जाएँगी…
शायद आज दिल का बोझ हल्का हो जाएगा…
लेकिन हर बार उम्मीद अधूरी ही रह गई।
अब सवाल यह नहीं था कि गलती किसकी थी।
सवाल यह था कि क्या दो लोग, जो एक-दूसरे से इतना प्रेम करते हैं, केवल इसलिए दूर हो सकते हैं क्योंकि दोनों अपनी-अपनी ख़ामोशियों में कैद हो गए?
शायद हर रिश्ते में कोई एक पूरी तरह सही और दूसरा पूरी तरह गलत नहीं होता।
कई बार दोनों अपने-अपने दर्द के साथ सही होते हैं।
लेकिन जब संवाद रुक जाता है, तब गलतफ़हमियाँ सच से भी ज़्यादा ताकतवर हो जाती हैं।
रिश्तों में नाराज़गी आना स्वाभाविक है।
मतभेद होना भी स्वाभाविक है।
लेकिन यदि समय रहते मन की गाँठें न खोली जाएँ, तो वही गाँठें धीरे-धीरे पूरे रिश्ते को बाँध देती हैं।
क्योंकि कई बार रिश्तों को शब्द नहीं तोड़ते…
उन्हें तोड़ देती है वह लंबी ख़ामोशी, जिसमें दोनों एक-दूसरे से बहुत कुछ कहना चाहते हैं, लेकिन कोई पहला शब्द बोलने का साहस नहीं जुटा पाता।
और शायद राघव और रिद्धिमा की कहानी हमें यही सिखाती है कि प्रेम का सबसे बड़ा प्रमाण केवल “आई लव यू” कहना नहीं होता…
बल्कि सही समय पर यह पूछ लेना भी होता है
“तुम सच में ठीक हो… या सिर्फ़ मेरे लिए ठीक होने का अभिनय कर रहे हो?”
क्योंकि कई बार एक सच्चा संवाद उन आँसुओं को रोक सकता है, जिन्हें बाद में पूरी ज़िंदगी भी नहीं पोंछ पाती।
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हस्ताक्षर…
दर्द के पार
मैं हूँ न
मुखौटा
आश्वासन
सपने सिसक रहे हैं
