
ममता मंजुला
प्रणय-गीत गाऊँ तो, गाऊँ मैं कैसे?
मैं फूलों से वेणी सजाऊँ, ये कैसे?
ये बेला नहीं प्रेम-अनुनय-विनय की,
ये श्रृंगार करने की ऋतु भी नहीं है,
ओ! मेरे प्रिय।
अभी तप रही है धरा द्वेषता से,
अभी प्रश्न करने हैं बहुत एकता से।
समय चाल गहरी, कुटिल चल रहा है,
ये मानव घृणा से स्वयं जल रहा है।
अभी पाप-पुण्य का समर चल रहा है,
मिलन-गीत मैं गुनगुनाऊँ भी कैसे,
ओ! मेरे प्रिय।
घिरा शत्रुओं से है आहत हिमालय,
दिए बुझ रहे, आज चिंतित शिवालय।
जो ज्ञानी हैं, भाषा-पुराणों को भूले,
अभी पंथ सारे अधर में हैं झूले।
अभी शोक-संतप्त है ममता का आँचल,
मैं क्रंदन में खुशियाँ मनाऊँ भी कैसे,
ओ! मेरे प्रिय।
लगाए उदासी ने घर-घर हैं डेरे,
विहग मौन रहते सवेरे-सवेरे।
खड़े जाल हाथों में लेकर शिकारी,
कुतरने परों को वे लाए कटारी।
लिए छीन रंग प्यार के इस घृणा ने,
चुनर प्रीत-रंग की रंगाऊँ मैं कैसे,
ओ! मेरे प्रिय।
अभी राष्ट्र-वंदन, समर्पण के दिन हैं,
अभी भारती को सजाने के दिन हैं।
अभी आँधियों में है दीपक जलाना,
अभी हमको रूठे सवेरे मनाना।
अभी रंग फीके पड़े एकता के,
इन हाथों में मेहंदी लगाऊँ भी कैसे,
ओ! मेरे प्रिय।
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