समर्पण
संग-संग चलें
धूप हो या वर्षा, सुख हो या दुःख सच्चा प्रेम हर परिस्थिति में साथ निभाने का नाम है। यह कविता जीवन और मृत्यु के शाश्वत सत्य के बीच अटूट विश्वास, समर्पण और साथ रहने के वचन को बेहद मार्मिक ढंग से व्यक्त करती है।
इच्छा और ईश्वर का संघर्ष
इच्छा और ईश्वर का संघर्ष’ एक गहन आध्यात्मिक लेख है, जो मनुष्य की अनंत इच्छाओं, ईश्वर की व्यवस्था और समर्पण के भाव के बीच के सूक्ष्म संबंध को समझाने का प्रयास करता है। यह लेख बताता है कि हर अधूरी इच्छा केवल अभाव नहीं, कई बार जागरण का मार्ग भी होती है।
समर्पण: आत्मा से परमात्मा तक
यह कविता आत्मा के परमात्मा में पूर्ण समर्पण की भावभूमि को अत्यंत सरल और मार्मिक शब्दों में व्यक्त करती है। इसमें भक्त और भगवान के बीच के उस गहरे, व्यक्तिगत संबंध को उकेरा गया है, जो किसी बाहरी आडंबर का मोहताज नहीं होता। कवि के लिए श्रीकृष्ण केवल आराध्य नहीं, बल्कि जीवन के हर भाव, हर संघर्ष और हर सत्य के आधार बन जाते हैं। श्रद्धा, वैराग्य और निष्काम भक्ति के माध्यम से यह रचना बताती है कि सच्चा समर्पण ही आत्मिक शांति और वास्तविक अस्तित्व का मार्ग है।
जब तुम आओ…
जब कोई मिलने आए, तो वह अधूरा नहीं, पूरा होकर आए—यही इस कविता का मूल भाव है। यह रचना बताती है कि आधे मन और बंटी हुई भावनाओं के साथ सच्चा समर्पण संभव नहीं होता। प्रेम तभी पूर्ण होता है, जब उसमें किसी प्रकार की कमी या विभाजन न हो।
तुमने सिखाया प्रेम…
यह कविता प्रेम, भक्ति और समर्पण की भावना को दर्शाती है, जहाँ प्रेम के माध्यम से ईश्वर का अनुभव होता है।
मित्र की मित्रता
यह कहानी एक ऐसे युवा की है जो अपने बीमार भाई के लिए पढ़ाई, करियर और भविष्य तक को दाँव पर लगाने को तैयार है। दोस्ती, परिवार और मानवता जब साथ खड़ी होती है, तो असंभव भी संभव हो जाता है।
हर जन्म की प्यास
मीठी नदी के आत्मस्वर में कही गई एक भावपूर्ण यात्रा है. जहाँ स्वप्नों की मिठास लेकर वह उदधि से मिलन को निकल पड़ती है। खारापन स्वीकार्य है, क्योंकि हर जन्म की प्यास वहीं शान्त होती है। वर्षों की भटकन, नयनों में भरा जल, और नमन से भरा समर्पण सब मिलकर प्रेम, प्रतीक्षा और स्वीकार की एक शान्त, उजली कथा रचते हैं।
अँधेरे में जुगनू
यह कविता प्रेम, प्रतीक्षा और आत्मसंवाद का सूक्ष्म आख्यान है। चाँद और बाहरी रोशनी को ठुकराकर कवयित्री अपने भीतर के जुगनुओं की रोशनी पर भरोसा करती है। लेकिन प्रेम की इच्छा जब प्रतीक्षा का दीपक बन जाती है, तो वही रोशनी धीरे-धीरे क्षीण होने लगती है। यह रचना उस क्षण को पकड़ती है, जब मन अँधेरे से डरता नहीं, बल्कि उसे शांति और मुक्ति का स्थान मानने लगता है।
महिदपुर रोड का पहला जलसा: चटर्जी नाइट
साल 1980 का महिदपुर रोड, गलियों में हलचल थी और हर कोई पहले बड़े जलसे “चटर्जी नाइट” की तैयारियों में व्यस्त। यह जलसा प्रिय शिक्षक स्व. कपूर साहब की स्मृति में आयोजित किया गया था। मंच की कमी के बावजूद विद्यार्थियों ने खाली ड्रम और लकड़ी के स्लीपर से एक शानदार मंच तैयार किया। जब प्रभात चटर्जी और उनका आर्केस्ट्रा मंच पर आए, तालियों और उत्साह की गूँज में पूरा महिदपुर रोड मंत्रमुग्ध हो गया। यह केवल संगीत का आयोजन नहीं, बल्कि श्रद्धा, समर्पण और जुनून की मिसाल बन गया।
