
डॉ.संगीता पांडे, पुणे
छोड़ दिया सब जग का नाता,
बस तुझसे लौ लगाई है।
हे गिरधर! तेरी भक्ति में ही,
मैंने अपनी दुनिया पाई है।
मंदिर-मंदिर क्या भटकूँ मैं,
तू तो मन के भीतर है।
तेरी मुरली की उस तान में,
मेरा सारा जीवन और सफर है।
कभी सुदामा जैसी श्रद्धा,
कभी मीरा सा वैराग्य मिले।
तेरे चरणों की धूलि पाकर,
मुरझाया मन भी खिल उठे।
लोग कहें ये बावरा है,
जो पत्थर से दिल लगाता है।
पर भक्त ही जाने कि सांवरा,
कैसे रिश्ते निभाता है।
न धन की कोई चाह मुझे,
न मोक्ष का ही लोभ रहा।
बस तेरे नाम की माला हो,
और साँसों में तेरा स्मरण रहा।
जब दुनिया राहें रोकती है,
तू हाथ पकड़ ले आता है।
अपने भक्त की खातिर तू,
खुद सारथी बन जाता है।
तू ही मेरा माखन-चोर,
तू ही गीता का ज्ञान है।
तेरी भक्ति में ही कृष्ण,
मेरा अस्तित्व और सम्मान है।
