बंधन रक्षा का
रक्षा की डोर केवल एक धागा नहीं, बल्कि विश्वास और वचन का बंधन है। ‘बंधन रक्षा का’ कविता कृष्ण और द्रौपदी के रिश्ते के माध्यम से इसी अटूट विश्वास और रक्षा के वचन को अभिव्यक्त करती है।

रक्षा की डोर केवल एक धागा नहीं, बल्कि विश्वास और वचन का बंधन है। ‘बंधन रक्षा का’ कविता कृष्ण और द्रौपदी के रिश्ते के माध्यम से इसी अटूट विश्वास और रक्षा के वचन को अभिव्यक्त करती है।
यह कविता आत्मा के परमात्मा में पूर्ण समर्पण की भावभूमि को अत्यंत सरल और मार्मिक शब्दों में व्यक्त करती है। इसमें भक्त और भगवान के बीच के उस गहरे, व्यक्तिगत संबंध को उकेरा गया है, जो किसी बाहरी आडंबर का मोहताज नहीं होता। कवि के लिए श्रीकृष्ण केवल आराध्य नहीं, बल्कि जीवन के हर भाव, हर संघर्ष और हर सत्य के आधार बन जाते हैं। श्रद्धा, वैराग्य और निष्काम भक्ति के माध्यम से यह रचना बताती है कि सच्चा समर्पण ही आत्मिक शांति और वास्तविक अस्तित्व का मार्ग है।
सभा के मध्य खड़ी द्रौपदी की आँखों में भय, अपमान और आक्रोश एक साथ उमड़ रहे थे। चारों ओर सत्ता के प्रतीक उपस्थित थे, पर न्याय कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। शकुनि के छल से आरंभ हुआ यह खेल अब उसकी अस्मिता पर आकर ठहर गया था। दुर्योधन की क्रूर मुस्कान और दुःशासन की निर्दयता ने सभा को और भी भयावह बना दिया था।
भीष्म और धृतराष्ट्र जैसे महान भी मौन थे, मानो धर्म स्वयं बंधन में जकड़ा हो। उस असहाय क्षण में द्रौपदी के भीतर से केवल एक ही पुकार उठी—कृष्ण। उसने अपने समस्त अहंकार, भय और पीड़ा को त्यागकर स्वयं को पूर्णतः उस परम शक्ति के हवाले कर दिया। और तभी, जब मानवता ने साथ छोड़ दिया, आस्था ने उसका हाथ थाम लिया—अदृश्य होकर भी कृष्ण उसकी लाज की रक्षा के लिए उपस्थित हो गए।
वह स्वयं को हर रूप में देखता है वामन, नरसिंह, माधव, नंदलाल एक ही सत्ता, अनेक लीलाएँ। और उसके सामने खड़ी है ‘कृष्ण प्रिया’, जिसकी पहचान केवल उसकी भक्ति है। ग्वालिन के वेश में, आँखों में प्रेम और अधरों पर पुकार लिए, वह बस इतना चाहती है कि कृष्ण नाम में खो जाए। उसके लिए वही तिलक है, वही श्रृंगार, वही जीवन। अंत में उसकी एक ही विनती रह जाती है. “जब मैं कहूँ… आओ न स्वामी, तो तुम आ जाना।”
यह कविता भगवान कृष्ण के अनेक दिव्य रूपों और लीलाओं का भावपूर्ण चित्रण करती है, जिसमें बाल्यकाल की नटखटता से लेकर धर्म और कर्म का उपदेश देने वाले सारथी रूप तक उनकी अनंत महिमा को दर्शाया गया है.
मैं जीना चाहती हूँ उन क्षणों को जब ब्रज में कृष्ण अपनी लीलाएँ रचते थे। नटनगर रास, बंसी की मधुर तान, गोपियों की हँसी और उनका अनन्य प्रेम—हर दृश्य हृदय में जीवंत हो उठता है। मैं देखना चाहती हूँ यशोदा मैया का लाल संग खेलना, सुदामा का स्नेह, और कान्हा की माखन चोरी। कभी-कभी लगता है कि यह भाव किसी पुराने युग की स्मृति है—शायद मैं भी कोई गोपी थी या ललिता जैसी सखी। मैं रुक्मिणी नहीं, बल्कि मीरा का विरह, राधा का अनन्य प्रेम और ब्रज की होली का उल्लास जीना चाहती हूँ।कृष्ण बनना सरल नहीं, पर उनके प्रेम में खो जाना—यही सबसे बड़ा सुख है।
हिंदी अपनी निर्बाध गति से आगे बढ़ती है और लोगों के दिलों को जोड़ती है। यह हिंदुस्तान का हृदय बनकर अपनी सरल और सहज चाल से सबको साथ लेती है। हिंदी संस्कृतियों के बीच पुल बनाती है और वर्जनाओं को तोड़ती है। यह सुहृदयजनों के भावों को अपनी ओर मोड़ती है और परंपराओं को तोड़कर नई परंपराएं बनाती है। हिंदी राम-रहीम और कृष्ण-करीम जैसी एकता को सामने लाती है, बंटी-बबली जैसी कहानियों को अपनाती है और अनेक भाषाओं के दरिया को अपनी ओर मोड़ती है। यह पूरब, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण से दिलों को जोड़ती है, प्रेम और इंसानियत को बढ़ाती है और नफरतों को दूर करती है।
गीता शब्द को सुनते ही मन में जिज्ञासा आना स्वाभाविक है की इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी। भगवान कृष्ण को अपने अलौकिक रूप में आकर रणक्षेत्र के बीच उपदेश देने की आवश्यकता क्यों पड़ी।कहते है उस समय रणक्षेत्र का दृश्य था की एक तरफ कौरवों की सेना दूसरी तरफ पांडवो की सेना थी और अपने ही परिवार जानो को दिख अर्जुन विचलित हो जाते है।