गीता शब्द को सुनते ही मन में जिज्ञासा आना स्वाभाविक है की इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी। भगवान कृष्ण को अपने अलौकिक रूप में आकर रणक्षेत्र के बीच उपदेश देने की आवश्यकता क्यों पड़ी।कहते है उस समय रणक्षेत्र का दृश्य था की एक तरफ कौरवों की सेना दूसरी तरफ पांडवो की सेना थी और अपने ही परिवार जानो को दिख अर्जुन विचलित हो जाते है।
अर्जुन –
स्वजनों को देख अरि रुप में समर बीच
अर्जुन विलखे की धनु ना उठाऊंगा
निज कुल को मिटा के राज पा भी लूं तो क्या
ऐसे जय से विलास कौन सा मैं पाऊँगा
जिनके मै गोद खेला शिक्षा और दीक्षा लिया
पुज गुरुजनों पर बाण क्यों चलाऊंगा
ऐसे ज्ञान से तो अज्ञानी होना श्रेष्ठ है
अपने कुटुंब को ही कैसे मैं मिटाऊंगा ।।
श्रीकृष्ण –
ये कथित ज्ञान जिन्हें कहते हो, वह मोह मात्र ही निमिष है
तुम क्षत्रिय धर्म को भूल रहे हो, क्या यह तुमको शोभित है
जब जब धर्म की अवनति होगी, तो जन्म मेरा निश्चित है
तुम तो मात्र निमित्त हो समझो, रण काल पूर्व घोषित है
यदि शस्त्र को तुम त्यागोगे, संहार नही क्या होगा?
अतएव द्वंद ये तज दो, जो होगा उत्तम होगा
तुम कर्म खड्ग को थामो, परिणाम को मुझ पर छोड़ो
सब जीवों में मैं ही हूं, अब देह की माया तोड़ो
हर कर्म की इक गति होगी, जो पूर्व से तय होगी
तुम लाख बदलना चाहो, जय तो धर्म की होगी
गर अहंकार को भूलों तो, सब में मुझको पाओगे
इस योनी चक्र से मुक्ति पा कर, मुझमें ही घुल जाओगे
तुम्हें देह मिली जो नश्वर है, जो अर्जन है वो चंचल है
ये रिश्तें वैभव सब छूटेंगे, मरण ही सत और मरण अटल है
फिर जिस पर नही नियंत्रण तेरा, उस पर क्यों शोक मनाते हो
भूमि पर गांडीव को धर कर, निरर्थक समय गवाते हो
अब बहुत हुआ अब उठ जाओ, हर संशय छोड़ो युद्ध करो
एक नए समाज का उदभव हो, इस युग में धर्म की नीव धरो

अन्नपूर्णा गुप्ता, सरगम, प्रसिद्ध साहित्यकार, कल्याण (ठाणे)
