
ममता सिंह देवा
बंधन है ये ऐसा
पवित्र है गंगा के जल सा,
शिशुपाल के अंत को
चलाया सुदर्शन वध को,
तब ऊँँगली कटी केशव की
लाल हुई धरा हस्तिनापुर की,
दौड़ी द्रौपदी फाड़ा चीर
बाँध केशव को रोकी पीर,
आशीर्वाद दिया तब केशव ने
अदा करने का प्रण लिया हर जीवन में,
फिर भरी सभा में पकड़ केश
अपनों ने धरा राक्षसों का वेश,
खींचें पांचाली के वस्त्र
नहीं उठाया किसी ने शस्त्र,
अपने ही परिवार ने दिया साथ
नहीं रोका निर्लज्ज का हाथ,
फिर कृष्णा* की गुहार पर
चीर बढ़ाई कृष्ण ने वहाँ पर,
लाज बचाया वचन निभाया
दयानिधि ने अपना रूप दिखाया,
ऐसा ही वचन दे हर कोई
रक्षा करूँगां तेरी जब भी तुझ पर विपदा आई,
जब भी रक्षा की करे पुकार
दौड़ कर आना बार–बार,
बांधी है जो रक्षा की डोर
एक सिरा है इस ओर,
खिचूंगी जब मैं हार कर
दौड़ना तब तुम कृष्ण बनकर ।
* कृष्णा– द्रौपदी का नाम

भाई-बहन के रिश्ते की पवित्रता, निःस्वार्थ रक्षा और अटूट विश्वास को इस कविता ने कितनी खूबसूरती से शब्दों में पिरो दिया है—मानो श्रीकृष्ण और द्रौपदी के पावन रिश्ते की भावनाएँ जीवंत हो उठी हों।
बहुत सुंदर 👌👌🙏