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किडनी दान कर छोटे भाई की देखभाल करती बहन राखी

राखी नहीं, बहन ने दी नई जिंदगी

रक्षाबंधन पर जबलपुर की राखी गुप्ता ने अपने छोटे भाई सोनू को अपनी किडनी दान कर जीवन का सबसे अनमोल तोहफा दिया. वर्षों से डायलिसिस करा रहे सोनू के लिए बहन का यह त्याग नई जिंदगी की उम्मीद बन गया.

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रक्षाबंधन के दिन अस्पताल में एक महिला अपने मुंहबोले भाई की कलाई पर राखी बाँधती हुई.

अनोखा रिश्ता रक्षाबंधन का

रक्षाबंधन के दिन अस्पताल में बनी एक बहन और एक अनजान भाई की कहानी. एक राखी से शुरू हुआ यह रिश्ता इतना गहरा हुआ कि दोनों ने इसे जिंदगीभर अपनेपन और प्रेम के साथ निभाया.

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रक्षाबंधन पर भाई की कलाई पर राखी बाँधती बहन

अनमोल प्रेम

कच्चे धागे में बंधा भाई-बहन का प्रेम किसी अनमोल रिश्ते से कम नहीं. रक्षाबंधन के पावन पर्व पर समर्पित यह कविता स्नेह, सम्मान और सुख-दुख में साथ निभाने की भावना को अभिव्यक्त करती है.

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द्रौपदी कृष्ण की कलाई पर कपड़ा बाँधते हुए

बंधन रक्षा का

रक्षा की डोर केवल एक धागा नहीं, बल्कि विश्वास और वचन का बंधन है। ‘बंधन रक्षा का’ कविता कृष्ण और द्रौपदी के रिश्ते के माध्यम से इसी अटूट विश्वास और रक्षा के वचन को अभिव्यक्त करती है।

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रक्षाबंधन पर भाई की कलाई पर राखी बाँधती और नोकझोंक करती बहन

भाई-बहन का रिश्ता

राखी के दिन भाई ने मजाक में कहा कि वह पैसे नहीं देगा और बहन ने गुस्से में उसकी राखी ही तोड़ दी। बचपन की यह छोटी-सी नोकझोंक आज एक ऐसी याद बन चुकी है, जो भाई-बहन के रिश्ते की मासूमियत और अपनापन बयां करती है।

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लद्दाख की सरहद पर तैनात सैनिक अपनी कलाई पर लाल धागा बाँधता हुआ

…राखी जो डाक से नहीं, दिल से पहुँची

राखी समय पर लद्दाख की सरहद तक नहीं पहुँच सकी, लेकिन बहन की आवाज़ और उसकी दुआओं ने सैनिक भाई की कलाई को सूना नहीं रहने दिया। पढ़िए भाई-बहन के अटूट प्रेम और देशभक्ति से जुड़ी यह भावुक कहानी।

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डाकखाने में पड़ी अनपहुंची राखियां और लिफाफे

कुछ राखियाँ…

कुछ राखियों को लिफाफे नहीं मिले और कुछ लिफाफों को राखियाँ. कुछ पर पते ही नहीं थे. यह कविता उन राखियों की कहानी है, जो कभी अपने गंतव्य तक नहीं पहुँच सकीं और अब रक्षा के बंधन से मुक्त हो चुकी हैं.

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रक्षाबंधन पर भाई की कलाई पर राखी बाँधती बहन

स्नेह की डोर : राखी

राखी केवल भाई की कलाई पर बंधा एक धागा नहीं, बल्कि उसमें बहन का स्नेह, भाई के लिए दुआएँ और बचपन की अनगिनत यादें बंधी होती हैं. ‘स्नेह की डोर — राखी’ भाई-बहन के इसी खूबसूरत रिश्ते की भावनात्मक कहानी है.

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रक्षाबंधन पर भाई की कलाई पर राखी बांधती बहन

रक्षाबंधन

खेल-खिलौनों और बचपन की हंसी-ठिठोली से लेकर राखी के नेह भरे धागों तक, यह कविता भाई-बहन के उस खूबसूरत रिश्ते की याद दिलाती है, जिसमें बचपन, दुआएं और स्नेह हमेशा साथ रहते हैं.

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राखी के धागों में उलझा बाज़ार और बदलते रिश्तों का रंग

स्नेह के धागों से सिक्त भाई-बहन के बीच अटूट प्रेम का उत्सव है रक्षाबंधन। पर जिस तरह हर त्योहार बाज़ारवाद की भेंट चढ़ता जा रहा है, वहीं रक्षाबंधन का यह पावन पर्व भी इससे अछूता नहीं रह गया। शायद यही कारण है कि आज त्योहार मनाने से पहले हर किसी को अपनी जेब टटोलनी पड़ती है। आखिर, बाज़ार की चमक-दमक और महंगे से महंगे तोहफ़े खरीदने की होड़ ने आम आदमी के हृदय में उपजने वाली उत्सव की सहज भावनाओं को कहीं न कहीं दबा दिया है।

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