रिक्त लटका झूला सावन में
पुराने बरगद के पेड़ में,
ताक रहा है राह को
ना जाने कब आएंगी बेटीयाँ।
पूछ रहा है वो पुराना बरगद का पेड़
अब सावन में क्यों नहीं आतीं हैं बेटियांँ
खिल उठता था गांव, चूड़ियों की खनक से
और हवा में घुल जाती थी मेहंदी की
भीनी खुशबू।
झूमने लगते थे पेड़ नाच उठती थीं लताएं
चहकती थी चिडियाँ डाल पर ।
घेवर की मिठास और पूडीयों की
सुगंध से महकते थे गलियारे
मनिहारी लगाती थी फेरा ,
पहनलो बेटीयों रंग बिरंगी चूड़ियाँ।
मधुर स्वरों में गुंजते थे सावन के
सुरीले गीत ,पर
ना जाने कब क्यों सावन में क्यों
नहीं आतीं नहीं हैं बेटियाँ।।

सुरभि डागर, प्रसिद्ध कवयित्री, बिजनौर

Awesome👏
‘पुराना बरगद का पेड़’ हमारी संस्कृति को बचाए रखने में योगदान देती हुई कविता है।अब तीज पर आज की पीढ़ी झूले नहीं डाला करती। बरगद का महत्व हमारे शास्त्रों में भी है। अच्छी कविता के लिए बधाई