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एक भारतीय बेटी आत्मविश्वास के साथ खड़ी है, जो “पराया धन” जैसी सामाजिक सोच से परे स्वतंत्र पहचान और आत्मसम्मान का प्रतीक है।

बेटियाँ पराया धन नहीं

“पराया धन” केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि वह सामाजिक सोच है जो बेटियों को अपने ही घर में अस्थायी महसूस कराती है। यह लेख स्त्री की स्वतंत्र चेतना, आत्मसम्मान और भावनात्मक सबलता की आवश्यकता पर गंभीर प्रश्न उठाता है और समाज से आग्रह करता है कि बेटियों को संपत्ति नहीं, स्वतंत्र व्यक्तित्व की तरह देखना सीखे।

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सावन, राखी और एक खाली दहलीज़

हर बेटी के लिए मायका सिर्फ़ घर नहीं, सांसों की मिट्टी होता है।पर कुछ बेटियों के हिस्से वो आँगन नहीं आता, जहां राखी, सावन और तीज मुस्कुराते थे। उनके त्योहार भी सादे, आंखें भीगी, और दिल भीतर से थोड़ा रिक्त रहता है…

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बेटियाँ

बेटियाँ घर की रौनक होती हैं चहकती, खिलखिलाती, और दिलों को जोड़ने वाली। बचपन से समझदार बनने तक, और विदाई के क्षण तक, वे अपनी यादें, प्यार और भावनाएँ एक संदुकची में समेटे चली जाती हैं।

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हरियाणा का गौरव गान

अंजू शर्मा ‘वशिष्ठ’ करनाल, हरियाणा हरियाणा है वीरों की धरती, शौर्य जहाँ की शान,रक्त में बसा पराक्रम, माथे पर अभिमान।मिट्टी यहाँ की महके वीरों के बलिदान से,हर दिल में गूँजे स्वर भारत माँ के गान से। पंडित लख्मीचंद की रागनी गूँजे, बनकर लोक कथाएं,नेकीराम शर्मा की वाणी, सच्चा पाठ सिखाए ।ऐसे वीरों की धरती ये,…

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पुराना बरगद का पेड़ 

रिक्त लटका झूला सावन में,
पुराने बरगद के पेड़ में,
ताक रहा है राह को —
ना जाने कब आएंगी बेटियाँ।
पूछ रहा है वो पुराना बरगद का पेड़ —
अब सावन में क्यों नहीं आतीं हैं बेटियाँ?

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