
झरना माथुर, प्रसिद्ध लेखिका
जिन लड़कियों के मायके नहीं होते,
उनके आंचल में चमकते तारे नहीं होते।
सावन भी पतझड़ सा सूना लगता है,
जब मां के पीहर से कोई बुलावे नहीं होते।
गर राखी के धागे में पड़ जाए गांठ,
तो फिर कृष्ण-द्रौपदी जैसे रिश्ते नहीं होते।
सूनी निगाहें राहें तकती रह जाती हैं,
उन आंखों में उम्मीद के उजाले नहीं होते।
अपनों के बीच भी परायापन चुभता है,
बिन कहे हाल समझने वाले अपने नहीं होते।
क्या गर्मी, क्या सर्दी की छुट्टियां,
इनके लिए तो तीज और राखी भी नहीं होते।
जिस सर पर ममता की छांव न हो,
उन बेटियों के सच में मायके नहीं होते…

Bahut badhiya