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सावन में मिठाई की दुकान पर घेवर और फेनी देखकर मायके और माँ को याद करती भावुक महिला

राखी, फेनी और माँ 

सावन की फुहारों के साथ सुमन को अपने मायके और माँ की याद सताने लगती है। राखी, फेनी और घेवर से जुड़ी छोटी-सी याद उसे उन रिश्तों तक ले जाती है, जो अब उसके जीवन में नहीं हैं।

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सावन, राखी और एक खाली दहलीज़

हर बेटी के लिए मायका सिर्फ़ घर नहीं, सांसों की मिट्टी होता है।पर कुछ बेटियों के हिस्से वो आँगन नहीं आता, जहां राखी, सावन और तीज मुस्कुराते थे। उनके त्योहार भी सादे, आंखें भीगी, और दिल भीतर से थोड़ा रिक्त रहता है…

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रंगोली

दिवाली नज़दीक थी, और हर साल की तरह श्रद्धा को ससुराल में ही त्योहार मनाना था, जबकि उसका मायका दो गली छोड़कर ही था। शादी के बाद से उसने कभी भी दिवाली के दिनों में माँ के आँगन में रंगोली नहीं बनाई, क्योंकि सास को उसका मायके जाना पसंद नहीं था। हर दिन वह ससुराल के आँगन में रंगोली बनाती, पर मन माँ के खाली आँगन में बसता, जहाँ अब रौनक खत्म हो चुकी थी। एक-दो बार मायके जाकर उसने देखा कि माँ आसपास के बच्चों से छोटी-सी रंगोली बनवाती हैं, पर न माँ ने उससे आने को कहा, न वह कह पाई। बात छोटी थी, पर कहने की हिम्मत आज तक नहीं जुटा पाई। उसे हमेशा यह दर्द रहा कि वह बेटी होकर भी अपने घर जाने के लिए ससुरालवालों की अनुमति पर निर्भर है—शायद इसी वजह से लोग बेटा मांगते हैं, क्योंकि बेटियाँ शादी के बाद अपने ही घर के लिए पराई हो जाती हैं।

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