हम कोख़जाये नहीं… मनजाये हैं…
लोकल ट्रेन की भीड़ में बने एक ऐसे भाई-बहन के रिश्ते की कहानी, जिसका कोई खून का रिश्ता नहीं, फिर भी उसमें अपनापन, सम्मान और भावनाओं की गहराई है.

लोकल ट्रेन की भीड़ में बने एक ऐसे भाई-बहन के रिश्ते की कहानी, जिसका कोई खून का रिश्ता नहीं, फिर भी उसमें अपनापन, सम्मान और भावनाओं की गहराई है.
रक्षाबंधन पर जबलपुर की राखी गुप्ता ने अपने छोटे भाई सोनू को अपनी किडनी दान कर जीवन का सबसे अनमोल तोहफा दिया. वर्षों से डायलिसिस करा रहे सोनू के लिए बहन का यह त्याग नई जिंदगी की उम्मीद बन गया.
कच्चे धागे में बंधा भाई-बहन का प्रेम किसी अनमोल रिश्ते से कम नहीं. रक्षाबंधन के पावन पर्व पर समर्पित यह कविता स्नेह, सम्मान और सुख-दुख में साथ निभाने की भावना को अभिव्यक्त करती है.
Image Alt Text
राखी के दिन भाई ने मजाक में कहा कि वह पैसे नहीं देगा और बहन ने गुस्से में उसकी राखी ही तोड़ दी। बचपन की यह छोटी-सी नोकझोंक आज एक ऐसी याद बन चुकी है, जो भाई-बहन के रिश्ते की मासूमियत और अपनापन बयां करती है।
राखी समय पर लद्दाख की सरहद तक नहीं पहुँच सकी, लेकिन बहन की आवाज़ और उसकी दुआओं ने सैनिक भाई की कलाई को सूना नहीं रहने दिया। पढ़िए भाई-बहन के अटूट प्रेम और देशभक्ति से जुड़ी यह भावुक कहानी।
कुछ राखियों को लिफाफे नहीं मिले और कुछ लिफाफों को राखियाँ. कुछ पर पते ही नहीं थे. यह कविता उन राखियों की कहानी है, जो कभी अपने गंतव्य तक नहीं पहुँच सकीं और अब रक्षा के बंधन से मुक्त हो चुकी हैं.
राखी केवल भाई की कलाई पर बंधा एक धागा नहीं, बल्कि उसमें बहन का स्नेह, भाई के लिए दुआएँ और बचपन की अनगिनत यादें बंधी होती हैं. ‘स्नेह की डोर — राखी’ भाई-बहन के इसी खूबसूरत रिश्ते की भावनात्मक कहानी है.
वर्षों बाद रक्षाबंधन पर भाइयों से मिलने पहुँची मनु के लिए यह सिर्फ राखी का त्योहार नहीं, बल्कि बचपन की उन यादों को फिर से जीने का अवसर था, जिन्हें समय कभी धुँधला नहीं कर पाया.
सावन की फुहारों के साथ सुमन को अपने मायके और माँ की याद सताने लगती है। राखी, फेनी और घेवर से जुड़ी छोटी-सी याद उसे उन रिश्तों तक ले जाती है, जो अब उसके जीवन में नहीं हैं।