संदेशा मायके का
सावन की फुहारों के बीच मीता की आँखों के सामने मायके की सुनहरी यादें ताजा हो जाती हैं। बिछड़ चुके अपनों की कमी और भाई-भाभी के स्नेह से भरी यह कहानी रिश्तों की गहराई को छूती है।

सावन की फुहारों के बीच मीता की आँखों के सामने मायके की सुनहरी यादें ताजा हो जाती हैं। बिछड़ चुके अपनों की कमी और भाई-भाभी के स्नेह से भरी यह कहानी रिश्तों की गहराई को छूती है।
सावन की फुहारों के साथ सुमन को अपने मायके और माँ की याद सताने लगती है। राखी, फेनी और घेवर से जुड़ी छोटी-सी याद उसे उन रिश्तों तक ले जाती है, जो अब उसके जीवन में नहीं हैं।
कुछ भाव ऐसे होते हैं जो शब्दों में नहीं ढल पाते, लेकिन सावन की पहली बारिश उन्हें आवाज़ दे देती है। “सावन को आने दो” ऐसी ही एक भावुक कविता है, जहाँ अनकहे जज़्बात बादलों के साथ उमड़ते हैं, बारिश की हर बूंद प्रेम का संदेश बन जाती है और मन किसी अपने की प्रतीक्षा में भीग उठता है। यह कविता प्रेम, प्रतीक्षा और मानसून की मधुर अनुभूतियों को बेहद संवेदनशीलता से व्यक्त करती है।
सावन के एक सांस्कृतिक समारोह में हुई एक साधारण-सी मुलाकात समय के साथ जीवनभर की सच्ची दोस्ती में बदल गई। यह संस्मरण विश्वास, अपनत्व, निस्वार्थ साथ और आत्मीय रिश्तों की सुंदर कहानी कहता है। इसमें बताया गया है कि कैसे ईश्वर की कृपा से मिलने वाले कुछ लोग जीवन का अभिन्न हिस्सा बन जाते हैं और हर सुख-दुख में बिना कहे साथ निभाते हैं।
सावन केवल बारिश का मौसम नहीं, बल्कि प्रकृति के नवजीवन, प्रेम, उल्लास और बचपन की मीठी यादों का उत्सव है। प्रस्तुत कविता “रिमझिम-रिमझिम सावन बरसे” में वर्षा की पहली फुहार, मिट्टी की सौंधी महक, मोर-पपीहे का उल्लास, हरी चूड़ियों की खनक और कागज़ की नावों से जुड़े बचपन के अनमोल पल अत्यंत सुंदर ढंग से अभिव्यक्त किए गए हैं।
श्री महाकालेश्वर मंदिर में 250 रुपये की शीघ्र दर्शन व्यवस्था से मई-जून में 24 करोड़ रुपये से अधिक की आय हुई है। सावन-भादौ में श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए महाकाल महालोक में 11 करोड़ रुपये की लागत से शेड, नई कतार व्यवस्था, क्यूआर आधारित बैरियर्स और ऑनलाइन अन्नदान सुविधा जैसी व्यवस्थाएं शुरू की जा रही हैं।
निशा की नीरवता में बैठी नायिका प्रतीक्षा में लिपटी है .हवा में भीगी चाँदनी, शरीर पर ओस की बूँदें जैसे भावना का स्पर्श कर रही हों। वह प्रिय के आगमन की राह में सजी-संवरी है, मानो सावन स्वयं प्रेम का संदेश लेकर आया हो। मन में उमड़ती आशाओं से मोतियों का हार पिरोती, पलकें प्रतीक्षा की लाली से भीग उठी हैं।
हर बेटी के लिए मायका सिर्फ़ घर नहीं, सांसों की मिट्टी होता है।पर कुछ बेटियों के हिस्से वो आँगन नहीं आता, जहां राखी, सावन और तीज मुस्कुराते थे। उनके त्योहार भी सादे, आंखें भीगी, और दिल भीतर से थोड़ा रिक्त रहता है…
कविता बचपन की उन मीठी यादों को जीवंत करती है जब बारिश में “कागज़ की कश्ती” सपनों का प्रतीक बन जाती थी। न चिंता थी, न भय—बस मासूमियत और आनंद था। अब वक्त बदल गया है; बारिश, दोस्त और वो बचपन सब पीछे छूट गए हैं। “कागज़ की कश्ती” आज सिर्फ उन सुनहरे दिनों की प्यारी याद बनकर रह गई है।
प्रेम में भीगकर तन-मन तरबतर हो जाता है। प्रिय की पनीली निगाहें जब देखती हैं तो भीतर जल-प्लावन-सा उमड़ पड़ता है। बहकी-बहकी हवाएँ चलती हैं तो तन और मन दोनों ही भाव-विभोर हो जाते हैं। मिलन और बिछोह का अनुभव मानो झूलों के आवागमन जैसा प्रतीत होता है। प्रिय के बदन को छूकर गुजरती हवाओं में सागर-सा लावण्य घुल जाता है। जब से वह मन के द्वार पर आया है, तन-मन उसका घर-आँगन बन गया है। अंतरतम में उसके बस जाने से तन मंदिर और मन पावन हो गया है।