घनघोर घटा सावन की…

“सावन जब अपने पूरे श्रृंगार में होता है, तब हर डाल झूमती है, हर कोना भीगता है — लेकिन एक बेटी के मन का कोना तब भी सूना रह जाता है जब वह बाबुल के आंगन से दूर होती है। अमराइयों की डालियाँ झूलों से भर जाती हैं, लेकिन उसकी आँखों में झूले पीहर की यादों के बनते हैं। मेघा की हर गर्जना में वह अपनी माँ की पुकार सुनती है, और हर रिमझिम बूँद में अपने बचपन की हँसी। सावन, जो बाकी दुनिया के लिए उल्लास है, एक बेटी के लिए कभी-कभी वेदना की धूप-छाँव भी बन जाता है।”

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पुराना बरगद का पेड़ 

रिक्त लटका झूला सावन में,
पुराने बरगद के पेड़ में,
ताक रहा है राह को —
ना जाने कब आएंगी बेटियाँ।
पूछ रहा है वो पुराना बरगद का पेड़ —
अब सावन में क्यों नहीं आतीं हैं बेटियाँ?

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बूंदों के नूपुर

अम्बर चमके दामिनी, रिमझिम पड़े फुहार, सोंधी माटी की महक से भीगता देहात, सावन की झूले झूलती सखियाँ, बादलों संग गूंजता बूंदों का संगीत — यह कविता मानसून के सौंदर्य, ग्रामीण जीवन के उल्लास और प्रकृति की रूमानी छवि को भावपूर्ण रूप में प्रस्तुत करती है।

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