रेगिस्तान में खड़ी एक पारंपरिक वेशभूषा में महिला, गर्म रेत और धूप के बीच संघर्ष और दृढ़ता का प्रतीक

मरु-स्त्री

मरु-स्त्री” एक ऐसी कविता है जो रेगिस्तान की कठोरता के बीच जीती स्त्री के भीतर छिपी अनकही विरासत और पीड़ा को उजागर करती है। यहाँ प्यास केवल एक शारीरिक अवस्था नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही एक मौन धरोहर है। यह स्त्री रेत की तरह बिखरती नहीं, बल्कि फैलकर अपने अस्तित्व को जीवित रखती है। उसकी हर चाल, हर चुप्पी और हर प्रतीक्षा में संघर्ष, सहनशीलता और जीवन की अदम्य शक्ति झलकती है जो मरुस्थल की सूनी धरती में भी हरियाली की तरह आशा जगाती है

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घूंघट में बैठी उदास नवविवाहित महिला, भावनात्मक और यथार्थपरक दृश्य

यह भी ज़िन्दगी है

“यह भी ज़िन्दगी है” एक ऐसी स्त्री की कहानी है, जो कम उम्र में विवाह, तानों और जिम्मेदारियों के बीच अपने सपनों को जीने की कोशिश करती है। यह कहानी हर उस महिला की आवाज़ है, जो चुप रहकर भी बहुत कुछ सहती है।

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कैक्टस: एक स्त्री की पीड़ा, प्रेम और स्वाभिमान की मार्मिक कहानी

कैक्टस

जूही दी की कहानी सिर्फ एक स्त्री की नहीं, बल्कि उन अनगिनत महिलाओं की दास्तान है जो रिश्तों को निभाते-निभाते खुद को खो देती हैं. जीवन भर उपेक्षा और भावनात्मक पीड़ा सहने के बाद जब बीमारी ने उनके शरीर को जकड़ लिया, तब भी उनके भीतर स्वाभिमान जीवित रहा. “कैक्टस” की तरह चुभते रिश्तों के बीच जीती हुई जूही दी अंततः एक ऐसे निर्णय के सामने खड़ी थीं, जहां दर्द से मुक्ति और आत्मसम्मान की रक्षा ही उनकी अंतिम इच्छा बन गई.

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श्मशान से लौटती साँसें…

श्मशान की राख से लौटकर जब ज़िंदगी की जिम्मेदारियाँ बाँहों में भर ली जाती हैं—तब यह कविता मृत्यु से आँख मिलाकर जीवन को चुनने का साहस बन जाती है।

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सावन, राखी और एक खाली दहलीज़

हर बेटी के लिए मायका सिर्फ़ घर नहीं, सांसों की मिट्टी होता है।पर कुछ बेटियों के हिस्से वो आँगन नहीं आता, जहां राखी, सावन और तीज मुस्कुराते थे। उनके त्योहार भी सादे, आंखें भीगी, और दिल भीतर से थोड़ा रिक्त रहता है…

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सोने की चूड़ियां

सुमेरा को सोने की चूड़ियों का बड़ा शौक था। बचपन से ही बस यही उसका इकलौता ख़्वाब था। उसे पूरा करने के लिए वह सिलाई और ट्यूशन करके पैसे जोड़ रही थी। आज वही सारी बचत उसने भाई की मेडिकल कॉलेज की फीस के लिए बड़ी खुशी से निकाल दी।
निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार का बेटा मेडिकल की पढ़ाई करेगा यह बात अपने-आप में बहुत बड़ी थी।

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दीवारें

बेटे के नए घर की चमक-दमक देखकर भी उसके मन में बस एक ही प्रश्न गूंजता रहा.“मेरी जगह कहाँ है?” कुछ दिन रुककर लौटी तो अपने पुराने घर की दीवारें भी जैसे समझा रही थीं.“अभी थकना नहीं… तेरे हिस्से का इंतज़ार अभी बाकी है।”

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कुसुम का धागा

सुबह की चाय का कप हाथ में लिए मैं अख़बार पढ़ रही थी कि एक खबर ने जैसे दिल को भीतर तक हिला दिया इंदौर में बस में छूटा नवजात शिशु, मां-बाप फरार.
खबर छोटी थी, पर असर बड़ा. कुछ पंक्तियों में लिखी उस घटना के पीछे जाने कितनी कहानियां दबी थीं. लिखा था. एक दंपत्ति बस में सवार हुए, गोद में एक नन्हा सा बच्चा था, मुश्किल से पंद्रह दिन का. थोड़ी देर बाद वे बोले कि कुछ सामान लेना है, बस से उतर गए.

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