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सब्र और त्याग से भरी भारतीय स्त्री का भावपूर्ण चित्र

सब्र…

बेटी से लेकर सास तक, एक स्त्री हर रिश्ते को अपना मानकर निभाती रहती है, फिर भी कई बार हर पड़ाव पर उसे पराया ही समझ लिया जाता है. यह कविता उसी स्त्री के सब्र, त्याग और अनकहे दर्द की कहानी है

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अपने अधूरे सपनों और जिम्मेदारियों के बीच संघर्ष करती एक भारतीय महिला का भावनात्मक दृश्य

उसने छोड़े नहीं थे, बस छिपा लिए थे सपने

कुछ लड़कियाँ अपने सपने छोड़ती नहीं, बस वक्त और जिम्मेदारियों के नीचे छिपा देती हैं। यह कहानी एक ऐसी ही लड़की की है, जिसने परिस्थितियों से समझौता किया, लेकिन अपने भीतर की पहचान को कभी मरने नहीं दिया।

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रेगिस्तान में खड़ी एक लड़की के पीछे नागफनी का पौधा, समाज में बेटियों के दर्द का प्रतीकात्मक दृश्य

नागफनी सी बेटियां !

यह कविता बेटियों के प्रति समाज में मौजूद भेदभाव और उपेक्षा की मार्मिक तस्वीर प्रस्तुत करती है। नागफनी के प्रतीक के माध्यम से दिखाया गया है कि प्रेम और स्वीकार्यता से वंचित लड़कियां भीतर से कोमल होते हुए भी परिस्थितियों के कारण कठोर बन जाती हैं।

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घूंघट में बैठी उदास नवविवाहित महिला, भावनात्मक और यथार्थपरक दृश्य

यह भी ज़िन्दगी है

“यह भी ज़िन्दगी है” एक ऐसी स्त्री की कहानी है, जो कम उम्र में विवाह, तानों और जिम्मेदारियों के बीच अपने सपनों को जीने की कोशिश करती है। यह कहानी हर उस महिला की आवाज़ है, जो चुप रहकर भी बहुत कुछ सहती है।

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कैक्टस: एक स्त्री की पीड़ा, प्रेम और स्वाभिमान की मार्मिक कहानी

कैक्टस

जूही दी की कहानी सिर्फ एक स्त्री की नहीं, बल्कि उन अनगिनत महिलाओं की दास्तान है जो रिश्तों को निभाते-निभाते खुद को खो देती हैं. जीवन भर उपेक्षा और भावनात्मक पीड़ा सहने के बाद जब बीमारी ने उनके शरीर को जकड़ लिया, तब भी उनके भीतर स्वाभिमान जीवित रहा. “कैक्टस” की तरह चुभते रिश्तों के बीच जीती हुई जूही दी अंततः एक ऐसे निर्णय के सामने खड़ी थीं, जहां दर्द से मुक्ति और आत्मसम्मान की रक्षा ही उनकी अंतिम इच्छा बन गई.

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श्मशान से लौटती साँसें…

श्मशान की राख से लौटकर जब ज़िंदगी की जिम्मेदारियाँ बाँहों में भर ली जाती हैं—तब यह कविता मृत्यु से आँख मिलाकर जीवन को चुनने का साहस बन जाती है।

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सावन, राखी और एक खाली दहलीज़

हर बेटी के लिए मायका सिर्फ़ घर नहीं, सांसों की मिट्टी होता है।पर कुछ बेटियों के हिस्से वो आँगन नहीं आता, जहां राखी, सावन और तीज मुस्कुराते थे। उनके त्योहार भी सादे, आंखें भीगी, और दिल भीतर से थोड़ा रिक्त रहता है…

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सोने की चूड़ियां

सुमेरा को सोने की चूड़ियों का बड़ा शौक था। बचपन से ही बस यही उसका इकलौता ख़्वाब था। उसे पूरा करने के लिए वह सिलाई और ट्यूशन करके पैसे जोड़ रही थी। आज वही सारी बचत उसने भाई की मेडिकल कॉलेज की फीस के लिए बड़ी खुशी से निकाल दी।
निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार का बेटा मेडिकल की पढ़ाई करेगा यह बात अपने-आप में बहुत बड़ी थी।

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