यह भी ज़िन्दगी है

घूंघट में बैठी उदास नवविवाहित महिला, भावनात्मक और यथार्थपरक दृश्य

एक स्त्री के अधूरे सपनों की कहानी

डॉ. मधु आंधीवाल, अलीगढ़

ब कुछ एक चलचित्र की भांति मेरी नज़रों से गुजर रहा है। नाज़ुक सी उमरिया मैं 16 साल की और तुम 22 साल के, दोनों अल्हड़। पवित्र अग्नि के सामने सात फेरे लेकर घर वालों ने हमें अटूट बंधन में बाँध दिया जैसे किसी नदी को रोक दिया हो।

जैसे एक गुड़िया, जो सहेलियों के साथ गुड्डा-गुड़िया खेलते-खेलते अचानक बहुत बड़ी हो गई हो। मैं खूब रोई बड़ी माँ की गोद में सिर रखकर। वह भी रो रही थीं, क्योंकि कल तक मैं उनकी छोटी परी थी। बड़े प्यार से बालों में तेल लगातीं और जीवन की सारी बातें सिखाती थीं। अब उन्हें भी डर लग रहा था पता नहीं ससुराल में कौन इसका ध्यान रखेगा। पर यह तो रिवाज है।

बहुत से सपने संजोकर मैं आपके साथ आपकी देहरी पर पहुँच गई। नाज़ुक सी, अपने घर में सबसे छोटी और सबकी लाड़ली। कार से नीचे पैर भी न रख पाई थी कि झांझर छनकी और एक तीखी आवाज़ सुनाई दी. “अरे, ये नई बहुरिया है! सर पर पल्ला भी नहीं ढका? यहाँ ये ढंग नहीं चलेगा।”मैं अवाक रह गई-यह कैसा ढंग है, नए घर में किसी के स्वागत का?

मैंने आँखों में आँसू लिए कातर निगाहों से तुम्हें देखा, पर तुम भी असहाय नज़र आए। मुझे अपने बड़े भाई की याद आ गई, जो ज़रा सी गलती पर मेरी ढाल बनकर खड़े रहते थे। “चलो, देखते हैं आगे क्या होता है…”
सोचते हुए मैं मेहमानों की भीड़ के बीच अंदर चली गई। कानाफूसी हो रही थी “शहर की दुल्हन है, शर्म-हया नहीं है।” मन कर रहा था फूट-फूट कर रो लूँ।

समय गुजरता गया। घुट-घुट कर, आपसे लड़ते-झगड़ते हुए भी आपकी मजबूरी समझती रही, पर आप मेरी भावनाओं को पूरी तरह न समझ पाए। सास, ननद और जेठानी के ताने सबको मैंने विष की तरह गले से नीचे उतार लिया।

समय के साथ हम दोनों परिपक्व हो गए। कभी-कभी लगता शायद अब आप मेरी भावनाओं को समझेंगे। अब बच्चे भी बड़े हो गए, उनकी भी गृहस्थी बसा दी।आज सब कुछ पास है बच्चे, आप… सब मेरा ख्याल रखते हैं। फिर भी न जाने क्यों, ज़िन्दगी में एक अधूरापन सा लगता है। यह आपकी कमी नहीं, बल्कि बीती बातों की परछाईं है।

चलो, अब सब भूल जाएँ। अब बाहों में समाने का समय नहीं, बल्कि एक-दूसरे का ख्याल रखने का समय है।

हाँ, यही भी ज़िन्दगी है।

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