भारतीय विवाह में पारंपरिक परिधान में सजी दुल्हन

विवाह गीत

यह विवाह गीत भारतीय लोक परंपरा की मिठास लिए हुए है, जहाँ शुभ दिन का उत्सव, घर-आंगन की सजावट, ढोलक की थाप और बेटी की विदाई के भाव एक साथ पिरोए गए हैं। गीत में न केवल आनंद और मंगलकामनाएँ हैं, बल्कि बेटी के नए जीवन के लिए आशीर्वाद, संस्कार और स्नेह की कोमल अभिव्यक्ति भी है।

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पुराना बरगद का पेड़ 

रिक्त लटका झूला सावन में,
पुराने बरगद के पेड़ में,
ताक रहा है राह को —
ना जाने कब आएंगी बेटियाँ।
पूछ रहा है वो पुराना बरगद का पेड़ —
अब सावन में क्यों नहीं आतीं हैं बेटियाँ?

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बूंदों के नूपुर

अम्बर चमके दामिनी, रिमझिम पड़े फुहार, सोंधी माटी की महक से भीगता देहात, सावन की झूले झूलती सखियाँ, बादलों संग गूंजता बूंदों का संगीत — यह कविता मानसून के सौंदर्य, ग्रामीण जीवन के उल्लास और प्रकृति की रूमानी छवि को भावपूर्ण रूप में प्रस्तुत करती है।

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