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मालवा में संजा पर्व के दौरान किलाकोट बनाती ग्रामीण किशोरियां

संजा: वह दीवार, वे गीत और जीजी के पीछे-पीछे चलता मेरा बचपन

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वायर न्यूज़, पुणे शाम होते ही गांव की गलियों में एक अलग ही हलचल शुरू हो जाती थी. घरों के चूल्हों से उठता धुआं धीरे-धीरे आसमान में घुलता, गाय-बछड़े लौटकर अपने ठिकानों पर पहुंचने लगते और खेतों से आती हवा में मिट्टी की सोंधी गंध घुल जाती. इसी समय मेरी बड़ी…

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भारतीय विवाह में पारंपरिक परिधान में सजी दुल्हन

विवाह गीत

यह विवाह गीत भारतीय लोक परंपरा की मिठास लिए हुए है, जहाँ शुभ दिन का उत्सव, घर-आंगन की सजावट, ढोलक की थाप और बेटी की विदाई के भाव एक साथ पिरोए गए हैं। गीत में न केवल आनंद और मंगलकामनाएँ हैं, बल्कि बेटी के नए जीवन के लिए आशीर्वाद, संस्कार और स्नेह की कोमल अभिव्यक्ति भी है।

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पुराना बरगद का पेड़ 

रिक्त लटका झूला सावन में,
पुराने बरगद के पेड़ में,
ताक रहा है राह को —
ना जाने कब आएंगी बेटियाँ।
पूछ रहा है वो पुराना बरगद का पेड़ —
अब सावन में क्यों नहीं आतीं हैं बेटियाँ?

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बूंदों के नूपुर

अम्बर चमके दामिनी, रिमझिम पड़े फुहार, सोंधी माटी की महक से भीगता देहात, सावन की झूले झूलती सखियाँ, बादलों संग गूंजता बूंदों का संगीत — यह कविता मानसून के सौंदर्य, ग्रामीण जीवन के उल्लास और प्रकृति की रूमानी छवि को भावपूर्ण रूप में प्रस्तुत करती है।

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