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तीज का त्यौहार

सावन की रिमझिम फुहारों और काली घटाओं के बीच जब मोर नाचने लगते हैं, तो प्रकृति का हर रंग और स्वर एक अलग ही उमंग लेकर आता है। ऐसे ही मौसम में तीज का पर्व गाँव-गिरांव से लेकर शहरों तक उल्लास फैलाता है। बिटिया की ससुराल कोथली लेकर जाते पिता, माँ-बाबा का स्नेह, पीहर आई बेटियाँ, बचपन की सखियों से मिलन — सब मिलकर सावन को खास बना देते हैं। झूले की पींगे, हँसी की चहक, कजरी की हूक और विरह की टीस — हर भाव इस मौसम में शामिल होता है। धानी चूनर ओढ़े धरती, आमों से लदी अमराई, घेवर की मिठास और मेलों की रौनक मिलकर सावन और तीज के इस त्योहार को यादगार बना देती है।

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पुराना बरगद का पेड़ 

रिक्त लटका झूला सावन में,
पुराने बरगद के पेड़ में,
ताक रहा है राह को —
ना जाने कब आएंगी बेटियाँ।
पूछ रहा है वो पुराना बरगद का पेड़ —
अब सावन में क्यों नहीं आतीं हैं बेटियाँ?

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