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तीज का त्यौहार

डॉ. पारुल तोमर, प्रसिद्ध लेखिका, नई दिल्ली

काली बदली देखकर
नाच रहे हैं मोर
सुग्गा कोयल बुलबुल
लगे मचाने शोर

कोथली भर पिता चले
बिटिया की ससुराल
माँ – बाबा के लाड़ से
बिटिया हुई निहाल

झूलों की पींगे बढ़ी
रिमझिम पड़े फुहार
पीहर आईं बेटियाँ
लेकर खुशी अपार

बचपन की सखियाँ मिली
भीगे मन के कोर
बतरस की झड़ी लगी
मधुर मनोहर शोर

गौरैया सी फुदकती
ननद करे मनुहार
झूला- झुलाओ भाभी
बिसराओ अब रार

विरहिन कजरी गा रही
हूक उठे दिन रात
पिया घर कब आएंगे
बीत रही बरसात

धानी चूनर ओढ़कर
धरा सुनाये हाल
आमियों से लदी-फदी
अमराई की डाल

घेवर की मिठास घुली
मीठा हुआ संसार
मेलों- ठेलों में सजा
तीज का त्यौहार
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