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तीज पर्व पर झूले पर बैठी महिला और शिव-पार्वती की पूजा

तीज

तीज केवल श्रृंगार और व्रत का पर्व नहीं, बल्कि प्रेम, त्याग, तपस्या और समर्पण का प्रतीक है. प्रस्तुत कविता में शिव-पार्वती के माध्यम से तीज के आध्यात्मिक और भावनात्मक पक्ष को अभिव्यक्त किया गया है.

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गहनों की चमक के बीच कविता और संस्कृति की झिलमिलाहट

त्यौहारों की चहक, लोकगीतों की मिठास और कविता की गूंजइन सबका संगम उस शाम देखने को मिला, जब सेनको गोल्ड शॉप ने तीज पर्व के अवसर पर एक विशेष आयोजन किया. आमतौर पर चमचमाते गहनों और ग्राहकों की चहल-पहल से सजी इस शॉप ने उस दिन संस्कृति, परंपरा और कला का रंगीन आँगन सजाया. शाम की शुरुआत पारंपरिक मेहंदी से हुई. आमंत्रित कवयित्रियों के हाथों में मेहंदी रचाई गई, जिसने पूरे वातावरण को तीज की सुगंध से भर दिया. मुस्कुराहटों और गीतों के बीच यह दृश्य मानो घर-आँगन के उत्सव को जीवंत कर रहा था.

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‘सावन की सहेलियां’ में खूब बिखरीं तीज की छटा

पारीक समाज महिला मंडल, पुणे द्वारा सावन और तीज के पावन पर्व को बड़ी धूमधाम और पारंपरिक उत्साह के साथ मनाया गया। “सावन की सहेलियाँ” नामक इस सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन खासतौर पर समाज की महिलाओं के लिए किया गया, जिसमें पारंपरिक वेशभूषा, लोकगीतों और नृत्य ने सभी को सावन के उल्लास में डुबो दिया।

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तीज का त्यौहार

सावन की रिमझिम फुहारों और काली घटाओं के बीच जब मोर नाचने लगते हैं, तो प्रकृति का हर रंग और स्वर एक अलग ही उमंग लेकर आता है। ऐसे ही मौसम में तीज का पर्व गाँव-गिरांव से लेकर शहरों तक उल्लास फैलाता है। बिटिया की ससुराल कोथली लेकर जाते पिता, माँ-बाबा का स्नेह, पीहर आई बेटियाँ, बचपन की सखियों से मिलन — सब मिलकर सावन को खास बना देते हैं। झूले की पींगे, हँसी की चहक, कजरी की हूक और विरह की टीस — हर भाव इस मौसम में शामिल होता है। धानी चूनर ओढ़े धरती, आमों से लदी अमराई, घेवर की मिठास और मेलों की रौनक मिलकर सावन और तीज के इस त्योहार को यादगार बना देती है।

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