क्यूँ जिंदा है…

ज़िन्दगी जब ये सवाल करे,
उत्तर अपने सारे बस बवाल करे,
मीठे बोले लगते हो खारे,
ख्वाब सारे रह जाए अधूरे,
जो आंखों में आंसू भर भर आये
उफ्फ! अब ना तो जिया जाए,
तब
मन की गिरह खोल के सारी,
सिर्फ़ रब को याद करना।
जो शामें आवारा सी लगने लगें,
साँसे शोर सराबा सी लगे,
हर सुबह ख़ुद से कहे,
ओह आज फ़िर जिंदा हूँ,
और अपने साए से भी डर लगे,
ख़ुद से नज़रे मिलाना मुश्किल लगे,
चेहरा आईने में ख़ुद को पराया सा लगे,
तब
मन की गिरह खोल के सारी,
सिर्फ़ रब को याद करना।
रिश्ते नाते बेमानी लगे,
यारों की यारी में ख़ुदगर्ज़ी लगे,
जिंदगी जब बोझ लगे,
दुनियां सिर्फ़ इक शोर लगे,
भरोसा ख़ुद से भी उठने लगे,
पूजा प्रार्थना चाहे लाख निष्फल सी लगे,
फ़िर भी
मन की गिरह खोल के सारी,
सिर्फ़ रब को याद करना।

डॉ.नीरु जैन, प्रसिद्ध लेखिका, जयपुर

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