जिंदगी और कट चाय

पल-पल बीतते जा रहे हैं, और जीवन का रस धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है। इसलिए बेकार की बातें छोड़कर मौजूदा समय का आनंद लेना चाहिए। मित्रों के साथ बिताए गए पल, उनकी हँसी, कभी-कभी उनके आँसुओं की चिंता, और साथ में पी गई चाय—ये सब छोटी-छोटी खुशियाँ जीवन को पूर्ण बनाती हैं। यह कविता समय की अनवरत गति, मित्रता, साधारण सुख और जीवन के क्षणों की क़ीमत का स्मरण कराती है।

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तुम क्या जानो…

तुम प्रेम को अधिकार और जीत मानते रहे, जबकि मेरे लिए यह समर्पण और खामोशी रहा। हर औरत में कहीं न कहीं एक मीरा होती है, जो बिना प्रतिदान की आशा प्रेम करती चली जाती है। हर युग में प्रेम तुमने जीता है, और हमने उसे जिया है—उस दर्द, विरह और त्याग के साथ।

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इश्क़ और जुदाई

ज़िंदगी अब बेबस-सी हो गई है, मानो किसी अपने को खो देने के बाद उसका सहारा ही छिन गया हो। आँखों में आँसू हैं, जिन्हें नजरों में छुपाकर रखा गया है। तालीम और सीख की राह इतनी आसान नहीं होती, क्योंकि उस्ताद को नादान बनाकर कभी सीखा नहीं जा सकता।
अहसान का कर्ज़ कभी अदा नहीं हो सकता, और फिर भी लोग फर्ज़ भूलकर अहसान को भी भुला देते हैं। जब यादों की धूप छूने लगती है तो उदासी का साया पास बैठ जाता है।इश्क़ कोई बाज़ी नहीं, बल्कि दिल का अफसाना है। इसे जीतने के लिए चुराना पड़े तो उसमें मज़ा नहीं रह जाता। नादान दिल इश्क़ में डूब चुका है, आँसुओं के सैलाब में बरबाद हो गया है।

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अजन्‍मी बेटी के सवाल

यह कविता एक अजन्मी बेटी की मार्मिक पुकार है, जो अपनी मां से सवाल करती है कि उसने जन्म से पहले ही उसकी जीवन-रेखा क्यों मिटा दी। वह बताती है कि वह तो मां की धड़कन भर थी, फिर भी उसे क्यों बोझ समझा गया। बेटे की चाह में मां ने समाज के उसूलों को मान लिया, पापा और दादी की तरह उसने भी बेटी के आने को नापसंद किया। वह कल्पना करती है कि अगर उसे जन्म मिला होता, तो वह सुनीता विलियम्स, कल्पना चावला, इंदिरा गांधी, किरण बेदी, साक्षी मलिक या पी. वी. सिंधु जैसी बनकर मां का नाम रोशन कर सकती थी। अंत में, वह कहती है कि अगर मां ने थोड़ा सा प्यार दिया होता, तो वह अपना पूरा जीवन मां की सेवा और सपनों को पूरा करने में लगा देती, लेकिन उसकी इच्छाओं को अनदेखा कर दिया गया। यह रचना बेटियों के प्रति समाज में फैली कुप्रथाओं और भ्रूण हत्या पर एक गहरा प्रश्नचिह्न लगाती है।

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क्यूँ जिंदा है…

“क्यूँ ज़िंदा है ज़िंदगी जब ये सवाल करे,
उत्तर अपने सारे बस बवाल करे,
मीठे बोले लगते हो खारे,
ख्वाब सारे रह जाए अधूरे,
जो आंखों में आंसू भर भर आये —
उफ्फ! अब ना तो जिया जाए,
तब मन की गिरह खोल के सारी,
सिर्फ़ रब को याद करना।”

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