पल-पल, हर पल बीत रहा है,
उम्र का पनघट धीरे-धीरे रीता है।
जाने मत दो जीवन-रस रीता,
छोड़ दो बेकार के “अबोले”।
जब दोस्त रोएँ, तो सही रोओ,
अनावश्यक शब्द मत बोले।
जान लो जल्दी, यमराज न देते
एक सेकेंड की भी छूट।
जाने कब जाना होगा,
छोड़ के “आधी चाय” की बात।
छोटू, अभी-अभी चलो,
तीसरी बार जाकर ले आ,
चार गिलास “कट चाय”,
और थोड़ी-सी हँसी के साथ।

विनीता गोविंदन, लेखिका, नई दिल्ली
