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जिंदगी और कट चाय

पल-पल बीतते जा रहे हैं, और जीवन का रस धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है। इसलिए बेकार की बातें छोड़कर मौजूदा समय का आनंद लेना चाहिए। मित्रों के साथ बिताए गए पल, उनकी हँसी, कभी-कभी उनके आँसुओं की चिंता, और साथ में पी गई चाय—ये सब छोटी-छोटी खुशियाँ जीवन को पूर्ण बनाती हैं। यह कविता समय की अनवरत गति, मित्रता, साधारण सुख और जीवन के क्षणों की क़ीमत का स्मरण कराती है।

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सूखी और बंजर जमीन के बीच उजड़ा हुआ भारतीय गाँव और खामोश बैठे लोग

तीन शब्द

समाचार पत्र के आठवें पृष्ठ के एक छोटे से समाचार ने उसे हिला दिया “ गाँव बिकाऊ है “| उसने इन तीन शब्दों को कई – कई बार पढ़ा | सोचने लगा , आवश्यकता और सुख के साथ – साथ पशु – पक्षी और मनुष्य तो बिक ही रहे थे अब गाँव भी ..`..
अजीब सा लगा उसे | घबराहट सी हुई |उसने अपने बैग को उठा कर गले में डाला और बाइक निकाल जा पहुंचा उस गाँव जहां बड़े – बड़े समाचार – पत्रों , चैनल्स की गाड़ियां साथ ही सरकारी तंत्र और वसाइयों की भी गाड़ियाँ खड़ी थीं | कैमरे चमक रहे थे | दाम लग रहे थे …
पता है किसके ……धूल उड़ाती , दरारों पटी बंजर जमीन के … अपनी ही गहराई नापते कुओं के … घर मकानों के… कोई नहीं पूछ रहा था पशुओं को ? न ही वहाँ के लोगों को ?

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