बेबस हुई है ज़िंदगी अब तुझको गंवाकर
नजरों में छुपा रखा है आँसू सा बना कर
तालीम मिले तुमको ये आसान नहीं है
क्या सीखते उस्ताद को नादान बना कर
अहसान का तो कर्ज अदा हो नहीं सकता
फिर फर्ज भुलाते हो ये अहसान भुलाकर
जब धूप मेरी याद की लगती मुझे छूने
साये में उदासी के बैठती हूँ यूँ जा कर
ये इश्क़ की बाजी नहीं दिल का है फ़साना
मिलता न मज़ा जीत भी जाओ जो चुरा कर
नादान है दिल डूब गया है जो इश्क़ में
बरबाद हो चुका है आँसुओं को बहा कर
ये बात कनक कैसे कहे उनसे सनम अब
सब राज हुए खत्म रखे थे जो छुपा कर

डॉ. कनकलता तिवारी, प्रसिद्ध साहित्यकार , मुंबई

बहुत-बहुत लाजबाब 👌 ग़ज़ल हुई है… उम्दा लेखनी 🙏🙏