तन्हाई और मोहब्बत के दर्द को दर्शाती हिंदी ग़ज़ल की भावनात्मक प्रस्तुति

मोहब्बत, खामोशी और कसक

कभी-कभी मोहब्बत शब्दों से नहीं, खामोशियों से समझ आती है। सामने वाला साथ होने का दावा करता है, लेकिन हर भीड़ में एक अजीब-सी तन्हाई घिर आती है। यादें तस्वीरों में कैद तो हो जाती हैं, मगर उनमें छिपी खाली जगह हर बार दिल को चुभती है। शायद यही इश्क़ की सच्चाई है जहाँ चाहत तो पूरी होती नहीं, और उसकी कसक हर पल साथ चलती रहती है।

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कविता, ग़ज़ल और एहसासों का उत्सव

मुंबई के गोरेगांव स्थित मृणालताई हॉल में चित्र नगरी संवाद मंच द्वारा साहित्य, संगीत और संवेदना से सजी एक मनभावन शाम आयोजित हुई। सकारात्मकता-नकारात्मकता पर रोचक चर्चा, कालजयी कविताओं का पाठ, ग़ज़लों की महक और पुस्तक विमोचन ने इस कार्यक्रम को खास बना दिया। साहित्यकारों, कलाकारों और श्रोताओं की दमदार मौजूदगी ने पूरे माहौल को जीवित और अर्थपूर्ण बनाया।

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ग़ज़ल

दिल-ए-नादाँ को रुसवा क्यों करें हम,ज़माने से यूँ शिकवा क्यों करें हम। हमारे दर्द को समझे नहीं वो,तो अपने मन को मैला क्यों करें हम। उन्हें बेपर्दगी का पास है जब,भला फिर उनसे पर्दा क्यों करें हम। जिसे परवाह उलफ़त की नहीं अब,उसी पर वक़्त ज़ाया क्यों करें हम। मुहब्बत कर ली क्या, आफ़त बुला…

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इश्क़ और जुदाई

ज़िंदगी अब बेबस-सी हो गई है, मानो किसी अपने को खो देने के बाद उसका सहारा ही छिन गया हो। आँखों में आँसू हैं, जिन्हें नजरों में छुपाकर रखा गया है। तालीम और सीख की राह इतनी आसान नहीं होती, क्योंकि उस्ताद को नादान बनाकर कभी सीखा नहीं जा सकता।
अहसान का कर्ज़ कभी अदा नहीं हो सकता, और फिर भी लोग फर्ज़ भूलकर अहसान को भी भुला देते हैं। जब यादों की धूप छूने लगती है तो उदासी का साया पास बैठ जाता है।इश्क़ कोई बाज़ी नहीं, बल्कि दिल का अफसाना है। इसे जीतने के लिए चुराना पड़े तो उसमें मज़ा नहीं रह जाता। नादान दिल इश्क़ में डूब चुका है, आँसुओं के सैलाब में बरबाद हो गया है।

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