किराए की खुशियाँ

कभी-कभी हम ऐसी खुशियों का इंतज़ार करते रहते हैं, जो हमारी ज़िंदगी में किराए की तरह आती हैं. कुछ समय रुकती हैं और फिर चली जाती हैं। हम जानते हैं कि वे स्थायी नहीं हैं, फिर भी दिल उन्हें पाने की उम्मीद करता रहता है। इस रिश्ते में भी यही हुआ। ख़ामोशी हमारी भाषा थी, नज़रें संवाद थीं, और उम्मीद हमारा सहारा। हमने अपनी ओर से सब कुछ दाँव पर लगा दिया, लेकिन साथ नहीं मिला। अब वही इंसान, जिसके साथ एक घर बसाने का सपना था, हर बात पर तकरार करता है, और बेरुख़ी को स्वीकार करता है जैसे ये उसकी नई आदत हो।

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इश्क़ और जुदाई

ज़िंदगी अब बेबस-सी हो गई है, मानो किसी अपने को खो देने के बाद उसका सहारा ही छिन गया हो। आँखों में आँसू हैं, जिन्हें नजरों में छुपाकर रखा गया है। तालीम और सीख की राह इतनी आसान नहीं होती, क्योंकि उस्ताद को नादान बनाकर कभी सीखा नहीं जा सकता।
अहसान का कर्ज़ कभी अदा नहीं हो सकता, और फिर भी लोग फर्ज़ भूलकर अहसान को भी भुला देते हैं। जब यादों की धूप छूने लगती है तो उदासी का साया पास बैठ जाता है।इश्क़ कोई बाज़ी नहीं, बल्कि दिल का अफसाना है। इसे जीतने के लिए चुराना पड़े तो उसमें मज़ा नहीं रह जाता। नादान दिल इश्क़ में डूब चुका है, आँसुओं के सैलाब में बरबाद हो गया है।

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आधुनिक रिश्तों में दूरी और भावनात्मक अकेलेपन को दर्शाता उदास प्रेम दृश्य

…जब मोहब्बत नुमाइश बन गई

अब मोहब्बत भी लिबासों की तरह हो गई है – रोज़ बदलती, ज़माने की रवायत बन चुकी। कभी जो खतों में दिल की धड़कनें उतरती थीं, अब वो सिलसिला कहीं खो गया है। प्यार की जगह नुमाइश रह गई है।

इश्क़ का मिज़ाज देखकर लगता है कि लोगों के पास अब बस फुरसत ही फुरसत है, लेकिन मोहब्बत की असल सदाएं कहीं गुम हो गई हैं। चाहत अब इबादत बनकर रह गई है, और वफ़ा के नाम पर धोखे मिलना किस्मत। आज दुआएं भी सिक्कों में लुटती हैं, अमीरी भी ज़लालत सी लगने लगी है। इरादों को गलत अंजाम देना दीवानों की हिमाकत कहलाता है और बिना वजह इल्ज़ाम लगाना, सियासत।

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मन 

यह कविता रिश्तों में पसरी हुई खामोशी और मन की गहराइयों में उपजी पीड़ा का चित्रण करती है। कवि कहता है कि यह खामोशी, मन को एक निर्जल और सूने कुएँ में धकेल देती है, जहाँ आकुलता और विकलता का साया छा जाता है। वहाँ न कोई चाहत होती है, न उम्मीद—नव अंकुर फूटने की संभावना भी नहीं।मन के किसी कोने में आशाएँ और अभिलाषाएँ सुंदर यादों की पोटली बनकर धरी रह जाती हैं। हर अहसास धीरे-धीरे पिघलकर पतझड़ के मौसम में बदल जाता है, और अंततः यह मन एक बांझ धरा की तरह फट पड़ता है।

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