
अंशु गुप्ता, सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल)
हे कृष्ण
तुम राधा का प्रेम,
तो मीरा का तप हो।
मिथ्या है यह संसार,
तुम ही मेरे सर्वस्व हो।
तुम ही कर्म,
और तुम ही फल हो,
कथ्य मेरे काव्य का,
तुम ही परम सत्य हो।
हे कृष्ण
तुम ही मेरा हृदय,
तुम ही मेरे भाव हो।
तुम ही अक्षरों से शब्द,
तुम ही शब्दों से वाक्य हो।
तुम ही पथिक का पथ हो,
तुम ही परम गंतव्य हो।
तुम ही राह मेरे जीवन की,
तुम ही मेरे प्रत्येक कदम हो।
हे कृष्ण
तुम ही विधि,
तुम ही विधान हो।
तुम ही मेरी चौखट,
तुम ही मेरे किवाड़ हो।
तुम ही छलिया,
तुम ही प्रबल हो।
तुम ही मेरा सहारा,
तुम ही मेरा संबल हो।
हे कृष्ण
तुम ही हो शक्ति,
तुम ही हो मुक्ति।
तुमसे ही मिली मुझको,
यह अनुपम भक्ति।
तुम ही हो श्रृंगार मेरा,
तुम ही कर्म-निधान।
तुम ही गांडीव के स्वामी,
तुम ही उसके बाण।
हे कृष्ण
तुम ही भीम की गदा,
तुम ही हर क्षण सदा हो।
तुम ही पात्र,
तुम ही कथा हो।
तुम ही दीनदयाल,
तुम ही दिवाकर।
‘अंशु’ कहे
स्वामी! तुम मेरे करुणा-सागर।
