कृष्ण भक्ति
शाश्वत कर्म
“शाश्वत कर्म” एक आध्यात्मिक कविता है, जो श्रीकृष्ण भक्ति, कर्मयोग और मानव जीवन के शाश्वत सत्य को सरल और भावपूर्ण शब्दों में प्रस्तुत करती है।
मीरा के नाम ख़त
मीरा के जीवन और भक्ति को याद करते हुए लेखिका अपने भीतर उठते असंख्य प्रश्नों से जूझती है। बिना देखे कृष्ण पर किया गया अटूट विश्वास, सांसारिक सुखों का त्याग और विषम परिस्थितियों में भी स्वयं को अक्षुण्ण रखना मीरा की भक्ति आज भी मन को विस्मित और प्रेरित करती है।
हटिया जन्माष्टमी पूजा समिति द्वारा भव्य काव्य महोत्सव
हटिया जन्माष्टमी पूजा समिति की ओर से हटिया रेलवे कॉलोनी स्थित डीआरएम ऑफिस के सामने बने पूजा पंडाल में छह दिवसीय श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव धूमधाम से मनाया जा रहा है। इसी क्रम में समिति द्वारा भव्य काव्य महोत्सव का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम अध्यक्ष इंद्रजीत सिंह, सचिव चंदन यादव और वरीय अध्याय अध्यक्ष डॉ. रजनी शर्मा के संयोजन में आयोजित इस कवि सम्मेलन में सभी आमंत्रित अतिथियों को राधे नाम अंगवस्त्र, मोमेंटो एवं पुष्प पौधा प्रदान कर सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ. रजनी शर्मा ने मधुर स्वर में सरस्वती वंदना से किया। कवि सम्मेलन की अध्यक्षता वरिष्ठ कवयित्री डॉ. सुरिंदर कौर नीलम ने की। उन्होंने अपनी रचना “जब मुरली बजी नटखट श्याम की, राधे-राधे हवाओं में होने लगी” प्रस्तुत कर माहौल को भक्ति रस से सराबोर कर दिया।
इस अवसर पर सदानंद सिंह यादव ने देशभक्ति पर आधारित मुक्तक व सोहर गीत गाए, पुष्पा सहाय गिन्नी ने कृष्ण प्रेम और विरह की भावपूर्ण अभिव्यक्ति की, वहीं सचिन शर्मा ने हवाईन गिटार पर शिव भजन और गीतों से श्रोताओं को झूमने पर मजबूर कर दिया
श्याम रंग में भीग चला मन
इस कविता में रचनाकार भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अपने गहरे प्रेम और आध्यात्मिक लगाव को अत्यंत भावपूर्ण ढंग से व्यक्त करता है। वह पाठक को कृष्ण के धाम की ओर जाने का निमंत्रण देता है — उस पावन भूमि की ओर, जहाँ संध्या होते ही गोपियाँ नृत्य करती हैं और हर दिशा भक्ति-रस में भीग जाती है। श्रीकृष्ण की एक झलक पाकर ऐसा अनुभव होता है मानो मृत्यु भी अब भयावह नहीं, बल्कि सुखद और शांति देने वाली हो गई हो। यह भाव उस आत्मिक स्थिति का संकेत है जहाँ ईश्वर-दर्शन के बाद जीवन-मरण का बंधन अर्थहीन प्रतीत होने लगता है। रचनाकार के लिए कृष्ण केवल एक देवता नहीं, बल्कि प्रेम और सत्य के प्रतीक हैं। उनके भीतर एक ईश्वरीय आभा और तेज है, जो उन्हें औरों से अलग बनाता है, यहाँ तक कि राम से भी। यह तुलना विरोध नहीं, बल्कि भावों की भिन्नता को दर्शाती है — राम मर्यादा के प्रतिनिधि हैं, तो कृष्ण प्रेम के।
प्रेम, परिक्रमा और प्रसाद : जंगल में प्रभु की लीला
गिरिराज जी की दंडवती परिक्रमा केवल यात्रा नहीं, बल्कि समर्पण और कृपा का साक्षात अनुभव है। एकाकी पथिकों से भेंट, अस्वस्थता में प्रभु की सहायता, अजनबी हाथों से मिला प्रसाद, जंगल में जल-अन्न और रात्रि की पूर्णिमा में गिरिराज का सान्निध्य हर क्षण यह अनुभूति देता है कि जहाँ विश्वास है, वहाँ प्रभु स्वयं मार्गदर्शक बन जाते हैं।
“बृज की रज, रबड़ी और राधा
गोवर्धन की परिक्रमा कोई साधारण यात्रा नहीं, यह आत्मा की तपस्या है। 27 से 30 सितंबर तक की इस दंडवती परिक्रमा में मैंने न केवल शरीर को बल्कि हृदय को भी बृजरज में लोटते पाया। हर कदम, हर प्रणाम में बृज का माधुर्य, भक्ति की ऊष्मा और सेवा का भाव समाया था। भक्तों का प्रेम, रास्ते के भंडारे, बुजुर्गों की प्रेरणा और मित्र का साथ — सबने मिलकर यह यात्रा एक दिव्य अनुभव बना दी। राधा कुंड में स्नान से लेकर कुसुम सरोवर की विद्युत छटा तक, हर पड़ाव ने मुझे भीतर तक छू लिया। यह यात्रा थी—तन की थकान को तज कर मन की शांति पाने की।
