घूम आओ कृष्ण के तुम धाम से।
गोपियाँ नाचे जहांँ पर शाम से।।
देख मोहन साथ कान्हा सब कहे।
जानते सब प्रीत के ही नाम से।।
देख उसकी इक झलक ऐसा लगा।
मौत आएगी बड़े आराम से।।
ईश सी आभा दिखे अरु तेज भी।
है अलग रिश्ता हमारे राम से।।
प्रेम से जीता यहाँ जग है सुनो।
क्या उसे जीते जहाँ ये दाम से।।
कर वकालत तू नहीं झूठी कभी।
त्रास दिल में रख सदा परिणाम से।।
इस हृदय को मोहता कोई नहीं।
प्रीति अब केवल लगी है श्याम से ।।

पूनम शर्मा, स्नेहिल, सुप्रसिद्ध कवयित्री, जमशेदपुर
