
सपना परिहार, बिरलाग्राम नागदा जं.
है अगर मुमकिन तो साथ दीजिए,
रूठे हैं अगर कोई, तो बात कीजिए।
यहाँ हर शख्स बेवजह परेशान-सा रहता है,
किसी की थोड़ी परेशानियाँ तो हल कीजिए।
मैं, मेरा, मुझे—यह सिर्फ उलझन ही तो है,
यह जो वहम है, उसे कभी मिटा तो दीजिए।
हर कोई यहाँ हर साँस का गुलाम है,
कभी उसे भी एक दरख़्त-सी छाँव तो दीजिए।
मुझसे बेहतर कोई नहीं है इस जहाँ में—
मेरे कहने से बस एक बार आईना देख लीजिए।
हर कोई यहाँ मगरूर नहीं होता,
कभी तो उसे समझने की कोशिश कीजिए।
यह लेन-देन का दौर बहुत बुरा है, “सपना”,
बहुत सोच-समझकर यह सौदा कीजिए।
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