कविता हूँ मैं

आत्मविश्वास से भरी महिला, आईने के सामने खड़ी, अपनी पहचान और सच्चाई को दर्शाती हुई

संध्या यादव, मुंबई

कविता हूँ मैं

मेरी अपनी ज़िम्मेदारियाँ हैं,
मुझे अच्छे से पता भी है
और उन्हें निभाना मुझे आता है…

शिलाजीत की गोली नहीं हूँ मैं,
कि हर दूसरी दुकान पर
रंग-बिरंगी पैकिंग में
सजती-बिकती नज़र आऊँ…

और तुम्हारी नाइलाज नपुंसक सोच और
मर चुकी संवेदनाओं का इलाज बनने में
अपना वक़्त यूँ ही गंवाऊँ
इतनी भी मजबूर नहीं हूँ मैं…

कविता हूँ मैं,
भीड़ का हिस्सा नहीं,
आईना हूँ
जैसा है वैसा ही दिखाऊंगी।

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