हाँ, मैं एक स्त्री हूँ…
यह कविता उस स्त्री की आवाज़ है जो समाज की परिभाषाओं से परे अपनी पहचान खुद गढ़ना चाहती है। संघर्ष, आत्मविश्वास और स्वाभिमान से भरी यह रचना स्त्री-अस्तित्व की सशक्त अभिव्यक्ति है।

यह कविता उस स्त्री की आवाज़ है जो समाज की परिभाषाओं से परे अपनी पहचान खुद गढ़ना चाहती है। संघर्ष, आत्मविश्वास और स्वाभिमान से भरी यह रचना स्त्री-अस्तित्व की सशक्त अभिव्यक्ति है।
कविता हूँ मैं’ एक सशक्त और बेबाक रचना है, जो स्त्री के आत्मसम्मान, पहचान और सच को उजागर करती है। यह कविता समाज की संकीर्ण सोच पर तीखा प्रहार करते हुए खुद को आईने की तरह प्रस्तुत करती है, जो सच्चाई को ज्यों का त्यों दिखाती है।