
अनिशा छेत्री, गंगटोक (पीएचडी स्कॉलर,सिक्किम यूनिवर्सिटी)
हाँ, मैं एक स्त्री हूँ,
लेकिन मुझे गहनों से सजा लिबास नहीं पहनना,
न ही चमकते हुए मुखड़े के साथ दुनिया को रिझाना है।
मुझे वह स्त्री बनना है
जो खुद के लिए जिए,
जो अपने सपनों के लिए संघर्ष करे,
जिसकी पहचान उसके हौसलों से हो,
न कि किसी के नाम से।
मुझे सपना है अपना एक घर बनाने का,
जहाँ मेरी मेहनत की खुशबू हो,
जहाँ मेरे फैसलों की दीवारें खड़ी हों,
और जहाँ मेरी आज़ादी साँस ले सके।
मुझे मोहब्बत है मेरे अकेलेपन से,
क्योंकि मैं अकेली नहीं हूँ
मेरे साथ मेरी कलम है,
मेरी किताबें हैं,
मेरे ख्वाब हैं,
और मेरा अडिग आत्मविश्वास है।
मैं वह स्त्री हूँ
जो टूटकर भी बिखरती नहीं,
जो गिरकर भी रुकती नहीं,
जो आँसुओं को अपनी ताकत बना लेती है।
मैं वह स्त्री हूँ
जो खुद अपनी कहानी लिखती है,
जो हर पन्ने पर अपने अस्तित्व की स्याही भरती है।
हाँ, मैं एक स्त्री हूँ
कमज़ोर नहीं, संवेदनशील हूँ,
निर्भर नहीं, स्वयंपूर्ण हूँ,
खामोश नहीं, मेरी खामोशी भी एक आवाज़ है।
और अब…
मैं किसी की परछाई नहीं,
मैं खुद अपनी पहचान हूँ।
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हाँ, मैं एक स्त्री हूँ…
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Wow bohut khub 🙏🕉️
बेहद खूबसूरत रचना💘🌹
हां,मैं एक स्त्री हूं…अनीशा छेत्री जी की सशक्त रचना
bahut sunder rachna