स्त्री

प्रेम में डूबी स्त्री कभी नादान-सी लगती है, कभी इतनी कोमल कि जैसे स्पर्श से बिखर जाए। उसके भीतर सपनों की हलचल है. उमड़ती-घुमड़ती, तितर-बितर होती तमन्नाएँ। वह तितली-सी है, जिसे उड़ना तो है, आसमान को छूना भी है, पर उसके चारों ओर फैली दुनिया उसे फूलों के दायरे से बाहर जाने ही नहीं देती। आसमान ऊँचा है, अपने ही गर्व में अडिग; और ज़मीन पर खड़ी वह स्त्री अपने पंख फैलाने को तैयार होते हुए भी उड़ नहीं पाती।

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प्रेम में…

प्रेम जब आया, तो स्त्री न केवल पत्नी रही, न प्रेयसी वह मां बन गई, धारण करने वाली, संभालने वाली। पुरुष भी न प्रेमी बन सका, न पूरा आदमी; वह तो जैसे शिशु हो गया, स्नेह और सहारे पर टिका हुआ। प्रेम ने पशु से भी पशुत्व छीन लिया और वह संत-सा शांत और सहज हो उठा। तब लगा, प्रेम कोई साधारण भाव नहीं यह क्रांति है,

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मन बंजारा

मन जैसे किसी अनजानी खोज में निकल पड़ा है। अब उसे ठहराव अच्छा नहीं लगता. तपती रेत भी उसे सुकून देती है. गर्म हवाओं के थपेड़े तन को झुलसा देते हैं, पर मन फिर भी मुस्कुरा उठता है। कभी कहीं से आती करुण पुकार उसे रुला देती है, तो कभी बिना कारण हँसी में डूब जाता है। माथे की बिंदिया, हाथों की चुड़ियाँ, झूलती बालियाँ .सब जैसे जीवन की थकान को सहला जाती हैं. रंग-बिरंगे घाघरों के बीच मटमैले सपने पलते हैं, और जब रात उतरती है, तो चाँदनी सबको अपनी गोद में सुला देती है.

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हलफनामा

पुरुष ने बड़ी कुशलता से मिट्टी और स्त्री में बीज बोने के अधिकार अपने अधीन कर लिए। उसने सब कुछ नियंत्रित किया, जिसमें स्त्री के मस्तिष्क का एक छोटा सा कोना भी शामिल था। दिखावे की रंगीन दुनिया में उसने बड़ी सफाई से अपना भार स्त्री के कंधे पर डाल दिया।

अब, जब स्त्रियों ने पुरुष सत्ता-कमान को कुशलता से संभाल लिया है, पुरुष तुरंत नए आदर्श स्थापित करने में जुट गया। अपराध भाव और जकड़न की स्थिति में विद्रोह की लौ को स्त्रियों ने सहजता से दबा दिया। यह धीरे-धीरे एक नए हलफनामे में तब्दील हो रहा है, जो बदलाव और संतुलन की दिशा में संकेत देता है।

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“लहरों की सखी”

यह कविता आत्मसंवाद और जीवन की गहराई का प्रतीक है। कवयित्री ने लहरों को अपनी सखी — यानी आत्मीय साथी — के रूप में देखा है। लहरें यहाँ सिर्फ समुद्र की गतिशीलता नहीं, बल्कि जीवन के उतार-चढ़ाव, भावनाओं की लय और त्मविश्वास की स्थायी धारा का प्रतीक हैं। जब कवयित्री कहती हैं “लहरों को बाहों में समेटे हुए मैं, अथाह समंदर को समेटती हुई”, तो यह अपने भीतर की असीम शक्ति और प्रेम को पहचानने की यात्रा बन जाती है।लहरें उन्हें उनकी परछाई दिखाती हैं, यानी स्वयं से मिलने का अवसर देती हैं।वे जीवन के सफर की गवाह हैं, जो कवयित्री को कभी भटकने या बहने नहीं देतीं. बल्कि उन्हें दृढ़, स्थिर और प्रेममय बनाए रखती हैं।

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देहरियों के पार..

एक स्त्री (या प्रतीक्षारत आत्मा) आकाश की नीली छाँव और हरियाली की गोद में खड़ी है। वह एक वृक्ष का सहारा लिए सदियों से प्रतीक्षा कर रही है—अपने चितचोर (प्रिय/प्रियतम) की खोज में। उसकी आँखें अपलक रास्ता निहार रही हैं और कान पदचाप की आहट सुनने को आतुर हैं।

समय गुज़रता गया, परंतु उसकी प्रतीक्षा समाप्त नहीं हुई। वह खुद को एक प्यासी नदी की तरह अनुभव करती है, जो कभी अमृत-सरीखी धारा बहाती थी, पर अब सूख चुकी है। फिर भी उसके भीतर यह विश्वास बना हुआ है कि उसका प्रिय अवश्य आएगा। यही एक सपना उसकी आँखों की रोशनी और मन की गर्माहट बनाए रखता है।

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स्त्री है त्रिशक्ति

स्त्री वास्तव में त्रिशक्ति का प्रतीक है—वह शारदा की ज्ञानमयी छवि है, शिवा की त्याग और साहस भरी ऊर्जा है और श्री की समृद्धि और करुणा से भरपूर है। उसका स्वरूप कभी पीपल की ठंडी छाँव-सा शीतल है तो कभी सावन की झड़ी-सा तरल और जीवनदायी। ठिठुरती सर्दियों में वह गुनगुनी धूप बन जाती है। सृष्टि की शुरुआत भी उसी से होती है और अंत भी उसी में समाया हुआ है।

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आज़ादी स्त्री की…

उस स्त्री की आत्मा कहती है—”मैंने हमेशा यही सोचा था कि मैं आज़ाद हूँ। पर हर पड़ाव पर बंधनों ने मुझे जकड़ लिया।
कभी भाई ने मेरे वस्त्रों पर नियंत्रण किया, कभी सास ने मेरी इच्छाओं को ढकने के लिए पल्ले और क्लिप्स थमा दिए। जीवन भर मैंने परंपराओं, रिश्तों और सामाजिक मान्यताओं के नाम पर अपने अस्तित्व को ढका। और फिर मृत्यु आई। सफेद चादर में लिपटी मैं, अपनी ही देह को राख होते देखती रही।

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स्त्री का दर्द और समाज की सच्चाई

“स्त्री जब प्रेम में छल खाती है या विवाह में अपमान सहती है, तब उसकी संवेदना टूटी हुई कांच की तरह बिखर जाती है। ममता और त्याग की प्रतिमूर्ति होकर भी वह अधूरी कहानी लिखने पर विवश होती है। कभी अपने बच्चों की गलत परवरिश का दोष भी उसी पर आता है, तो कभी परिवार के विघटन का बोझ भी उसके कंधों पर डाल दिया जाता है। यदि नारी नफ़रतों के बीज बोना छोड़ दे और पुरुष अन्याय पर अपनी सहमति न दे, तभी प्रेम का प्रकाश फैलेगा और समाज में करुणा का पुनर्जन्म होगा। जिस दिन प्रेम हर हृदय में विस्तारित होगा, उस दिन नारी सचमुच लक्ष्मी स्वरूपा बनकर पूजी जाएगी।

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ना रोक खुद को अब…

हर कठिनाई से लड़ने की ताकत रखती है तू, तो फिर सुन स्त्री, अब अपने स्त्री होने पर शर्म नहीं, गर्व किया कर। जहाँ मन लगे, वहाँ दिल लगाना तेरा अधिकार है, और आईने में मुस्कुराकर खुद को पहचानना भी। तू सिर्फ जिम्मेदारियों में नहीं, हक़ में भी जी सकती है – खुद से प्यार कर, खुद को सजा, और दुनिया को दिखा कि तू क्या है।”

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