
-अर्चना अश्क मिश्रा
प्रेम में स्त्री,
नादा-सी स्त्री,
कोमल-सी स्त्री,
बेपरवाह-सी स्त्री,
तितली-सी स्त्री,
उड़ नहीं पाती है।
तमन्नाएँ उसकी
उमड़-घुमड़,
तितर-बितर,
फूलों के ही
इर्द-गिर्द
घूमती रहती हैं।
उड़ना चाहती है वो भी,
छूने को आसमां,
पर आसमां
झुक नहीं सकता ज़मीं तक।
